अभिषेक पंडित के संवाद ने सिनेमाई विजन को दी नई धार

विंध्य भारत, रीवा

विंध्य की सांस्कृतिक धरा पर पांच दिनों तक चला कला, सिनेमा और साहित्य का महाकुंभ चित्रांगन अंतरराष्ट्रीय फि़ल्म एवं थिएटर फ़ेस्टिवल रविवार को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर संपन्न हुआ। जहां पहले दिन नीतीश भारद्वाज के ‘चक्रव्यूह’ ने पौराणिक गाथा का सूत्रपात किया था, वहीं अंतिम दिन अंतरराष्ट्रीय बैंड इंडियन ओशन की रॉक-फ्यूजन लहरों ने विंध्य के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पांच दिनों तक कला, संवेदना और सृजन की गंगा विंध्य धरा पर बही, आज उसके भव्य और ऐतिहासिक समापन का अवसर था । छठवें चित्रांगन अंतरराष्ट्रीय फि़ल्म एवं थिएटर फ़ेस्टिवल का अंतिम रीवा के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का घोषणापत्र बन कर उभरा, जहाँ पहले दिन नीतीश भारद्वाज अभिनीत ‘चक्रव्यूह’ ने महाभारत के दर्शन से शुरुआत की थी, वहीं समापन की शाम इंडियन ओशन के वैश्विक संगीत के नाम रही।
महोत्सव के अंतिम दिन का बौद्धिक सत्र आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) से आए प्रख्यात नाट्य विशेषज्ञ और अभिनेता अभिषेक पंडित के नाम रहा। अभिषेक पंडित, जो अपने सूत्रधार संस्था के द्वारा वर्षों से लोक-कलाओं को आधुनिक रंगमंच और सिनेमा से जोडऩे के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने स्थानीय कलाकारों के लिए अत्यंत उपयोगी कार्यशाला लेते हुए बताया कि कैसे क्षेत्रीय बोलियाँ और लोक-कथाएं वैश्विक सिनेमा का आधार बन सकती हैं। उन्होंने आजमगढ़ से रीवा तक की सांस्कृतिक समानता पर बात करते हुए कहा कि “कलाकार को अपनी जड़ों की मिट्टी को पहचानना चाहिए, क्योंकि असली कला, रंगमंच और सिनेमा वहीं से उपजता है।” कलाकार को शॉर्ट कट लेने की जगह, बेहतर और विधिवत प्रशिक्षण लेना चाहिए । क्षणिक प्रसिद्धि के चक्कर में अपने भविष्य को खराब न करें । अभिषेक पंडित ने नाट्य प्रस्तुतियों में संगीत और लोक-मुहावरों के सही उपयोग पर ऐसी तकनीकी जानकारियां दीं, जो युवा निर्देशकों के लिए मील का पत्थर साबित होंगी।
छठवें चित्रांगन अंतरराष्ट्रीय फिल्म एवं नाट्य महोत्सव की आखऱिी शाम होते ही कृष्णा राज कपूर ऑडिटोरियम के बाहर और भीतर ऐतिहासिक माहौल तैयार होने लगा था, कारण था भारत के सबसे बड़े इंडिपेंडेंट रॉक बैंड इंडियन ओशन के पहली बार रीवा में मंच पर होने वाली प्रस्तुति। जैसे ही मुख्य गायक राहुल राम ने अपने सिग्नेचर अंदाज़ में गिटार की तान छेड़ी, पूरा ऑडिटोरियम युवाओं की खुशनुमा आवाज़ों और तालियों से गूँज उठा। बैंड ने जब अपना मशहूर गीत ‘कंदिसा’ गाया, तो दर्शक अपनी सीटों से उठकर थिरकने लगे। इसके बाद मसान फि़ल्म का ‘तू किसी रेल सी गुजरती है’ और ‘मारेवा’ जैसे गीतों ने माहौल को रूहानी बना दिया। ड्रम पर अमित किलकी की थाप और निखिल राव के गिटार के सोलो ने संगीत प्रेमियों को एक अलग ही दुनिया में पहुँचा दिया। यह केवल संगीत संध्या रीवा के इतिहास में दर्ज होने वाली सांस्कृतिक सुनामी लाने वाली प्रतीत हो रही थी ।
समापन समारोह में दिव्यांशु गौतम ने अपने संदेश में बताया कि मैने इस महोत्सव में पूरी नजऱ रखी है, इस तरह के आयोजन ही इस परिसर की उपयोगिता सिद्ध करते हैं, नीतिश भारतद्वाज, कुमुद मिश्रा, रघुवीर यादव जैसे कलाकारों का अंकित, शुभम और इनकी टीम के बुलावे में आना बताता है कि रीवा अब अंतरराष्ट्रीय कला मानचित्र पर स्थापित हो चुका है।

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