कुछ पद सिर्फ कम शिक्षितों के लिए
अधिक पढ़े-लिखे लोग कम योग्यता वाले पदों पर नहीं कर सकते दावा
नई दिल्ली :सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कम शैक्षणिक योग्यता के लिए आरक्षित नौकरी के लिए अपनी शिक्षा छुपाना पद के असली हकदार से रोजगार छीनना है। इसलिए उच्च योग्यता छिपाकर ली गई नौकरी कानूनन अमान्य होगी। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कोर्ट ने सिंडिकेट बैंक के अटेंडेंट की नौकरी पाने के लिए ग्रेजुएशन की डिग्री छुपाने वाले एक व्यक्ति के पक्ष में फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कम पढ़े-लिखे लोग कम योग्यता वाली नौकरियों में ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। ऐसे में सरकार का कुछ पदों को कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए सुरक्षित रखना पूरी तरह सही है। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार सभी योग्य उम्मीदवारों को तय नियमों के तहत ही मिलना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि कोई उम्मीदवार तय सीमा से अधिक पढ़ा-लिखा है, उसे उस कम योग्यता वाले पद पर नियुक्ति का कोई स्वत: अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट के अनुसार, अगर कोई अधिक पढ़ा-लिखा व्यक्ति कम योग्यता वाले पद पर नौकरी पाता है, तो वह उस व्यक्ति का अवसर छीन लेता है जो वास्तव में उस पद के लिए योग्य और हकदार है। पीठ ने कहा कि जब कोई पद विशेष रूप से कम शैक्षणिक योग्यता वाले उम्मीदवारों के लिए हो, तो वहां अधिक योग्यता वाले व्यक्ति को अनुमति देना गलत है। इससे उन लोगों के साथ अन्याय होता है जो जीवनी परिस्थितियों के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि योग्यता की ऊपरी सीमा तय करना पूरी तरह तर्कसंगत और न्यायसंगत है। राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कुछ पदों को ऐसे लोगों के लिए आरक्षित रख सकता है। इससे उन्हें उन उम्मीदवारों से मुकाबला नहीं करना पड़ता जिनके सामने उनके चयन की संभावना बहुत कम होती है।
‘अदालत मामलों के निपटारे की समय सीमा तय नहीं करेगी
सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया जिसमें मुकदमों को तय समय में निपटाने के लिए नियम बनाने की मांग की गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे इस मामले को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया, स्टेट बार काउंसिल और विभिन्न बार एसोसिएशनों के पास जाएं। अदालत ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि वे वकीलों से दुश्मनी नहीं लेना चाहते क्योंकि हम वकीलों के दोस्त हैं।
शिक्षकों को टेट पास करना ही होगा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में काम कर रहे शिक्षकों के लिए टीचर इलिजिबिलटी टेस्टपास करना अनिवार्य है। कोर्ट ने टेट पास करने की समयसीमा 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी। हालांकि कोर्ट ने कहा कि इसके बाद कोई और समय नहीं दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा बिना टेट योग्यता वाले शिक्षक सेवा में बने रहे तो इसका असर आने वाली पीढिय़ों की शिक्षा पर पड़ेगा। फैसले का असर देश के 20 लाख से ज्यादा शिक्षकों पर होगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दीं। ये याचिकाएं राज्य सरकारों, शिक्षक संगठनों और व्यक्तिगत शिक्षकों ने दायर की थीं। सभी ने 2025 के फैसले पर पुनर्विचार मांगा था।
सरकारी नौकरी में तय योग्यता का पालन जरूरी:सुप्रीम कोर्ट