मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि कोई भी बालिग महिला अपनी इच्छा से यह तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है कि वह कहां रहेगी, किससे शादी करेगी और आगे पढ़ाई करेगी या नहीं। राज्य या उसके अधिकारी उसे जबरन माता-पिता के घर लौटने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र गुघे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि 21 वर्षीय महिला ने हैदराबाद स्थित अपने माता-पिता के घर को अपनी इच्छा से छोड़ा था। वह बालिग है और कानून के अनुसार यह फैसला लेने में सक्षम है कि वह कहां रहना चाहती है, शादी करना चाहती है या नहीं और अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है या नहीं।
हाई कोर्ट ने कहा कि ये सभी फैसले व्यक्ति की निजी पसंद से जुड़े हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘न तो माता-पिता और न ही राज्य किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ उसके घर लौटने के लिए मजबूर कर सकते हैं’। हाई कोर्ट ने कहा कि जब महिला अपनी मर्जी से घर छोडक़र गई है, तो पुलिस उसे लापता व्यक्ति मानकर कार्रवाई नहीं कर सकती। साथ ही उसे घर वापस भेजने के लिए किसी तरह का दबाव या जबरदस्ती भी नहीं की जा सकती। अदालत ने तेलंगाना पुलिस को निर्देश दिया कि महिला के माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई लापता व्यक्ति की रिपोर्ट को बंद करने की प्रक्रिया शुरू की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि महिला को उसके माता-पिता के घर लौटने के लिए मजबूर न किया जाए।
बालिग को अपने घर लौटने के लिए राज्य नहीं कर सकता मजबूर्र: बॉम्बे हाईकोर्ट