अनुच्छेद 370 हटाना श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सर्वोच्च बलिदान को सबसे सच्ची श्रद्धांजलि


नरेंद्र मोदी
साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35(ए) को हटाना डॉ. मुखर्जी के बलिदान के प्रति देश की सबसे सच्ची श्रद्धांजलि थी। डॉ. मुखर्जी का जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का एक ऐसा प्रेरणादायक उदाहरण है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में नींव का पत्थर रखने का काम किया। उन्होंने हमेशा भारत और भारतीय मूल्यों को सबसे ऊपर रखा। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। मुखर्जी के जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने ऐसे समय में भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया, जब देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। भारतीय जनसंघ, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का पूर्ववर्ती संगठन है। छह जुलाई 1901 को जन्मे मुखर्जी का 23 जून 1953 को श्रीनगर में हिरासत के दौरान निधन हो गया था। उन्होंने अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग करते हुए जम्मू कश्मीर को शेष भारत के साथ पूरी तरह से एकीकृत करने के लिए संघर्ष किया था। छह जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहे हैं, जिनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था और आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। मुखर्जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। शहरऔर स्थानीय मार्गदर्शिका मुखर्जी का दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वह अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। उन्होंने कहा कि पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पडऩे दिया तथा उनका संकल्प और भी सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।अगर कोई एक आदर्श था जिसने मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन को सबसे ज्यादा परिभाषित किया, तो वह था भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी।’जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ तब वह उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में अनुच्छेद 370 और 35(ए) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी। उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दीपक’ यानि मिट्टी का दीया रखा गया।’’ एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया। इतिहास डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनकी सोच बहुत विराट थी। वह उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वह संपदा और मूल्य निर्माण के महत्व को भली-भांति समझते थे। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया। भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वह मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीडि़तों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढक़र भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।
लेखक भारत के प्रधानमंत्री है

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