जाति गणना केवल सेल्फ डिक्लेरेशन से नहीं होनी चाहिए:सुप्रीम कोर्ट

किसी भरोसेमंद तरीके से या सबूत के आधार पर करने पर विचार करें
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2027 की जनगणना में जाति गणना सिर्फ सेल्फ डिक्लेरेशन के आधार पर नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय इसे किसी भरोसेमंद तरीके से या सबूत के आधार पर करने पर विचार करें। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने आकाश गोयल की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल बिना जांच वाले सर्टिफिकेट के आधार पर किसी को शामिल या बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनगणना एक विशेष और तकनीकी प्रक्रिया है। यह तय करना जनगणना अधिकारियों और विशेषज्ञों का काम है कि डेटा कैसे इक_ा किया जाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि जाति आंकड़ों की पहचान के लिए कोई पूर्व-निर्धारित डेटा मौजूद नहीं है। हालांकि याचिकाकर्ता की चिंताओं को प्रतिनिधित्व के रूप में सामने रखा जा सकता है। आपने सराहनीय काम किया है। आपने अधिकारियों का ध्यान इस मुद्दे की ओर दिलाया है और उन्हें संवेदनशील भी किया है। अगर इसके बावजूद कोई गलती होती है, तो कानून अपना रास्ता खुद तय करेगा। जनगणना अधिनियम, 1948 और 1990 में बने नियमों के तहत होती है। इन नियमों के अनुसार जनगणना के विवरण और प्रक्रिया तय करने का अधिकार संबंधित अधिकारियों को है। कोर्ट को भरोसा है कि विशेषज्ञों की मदद से एक मजबूत व्यवस्था बनाई गई होगी, जिससे गलतियों की आशंका न रहे। हम सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अधिकारियों को यह निर्देश दें कि वे इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर विचार करें। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह कानूनी नोटिस और याचिका में दिए गए सुझावों पर उचित विचार कर सकती है।

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