तीन पुलिस अधिकारियों की अग्रिम जमानत रद्द कर दी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कथित जबरन वसूली के तीन पुलिस अधिकारियों आरोपी की अग्रिम जमानत रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा, जब कानून लागू करने वाले अधिकारी जबरन वसूली करने वाले बन जाते हैं, तो नागरिक संदेह की नजर से देखता है और दुविधा में पड़ जाता है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और के विनोद चंद्रन की पीठ ने बॉम्बे उच्च न्यायालय की ओर से पारित आदेश को ‘अस्पष्ट’ बताते हुए रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, विरोध करना तत्काल प्रतिशोध को न्योता देना है और एकमात्र विकल्प वर्दीधारी अधिकारियों के सामने चुपचाप आत्मसमर्पण करना है। पीठ ने कहा ‘हमें आश्चर्य है कि उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि उनमें संकट का कोई संकेत नहीं है, विशेषकर तब जब फुटेज में उनके भाव स्पष्ट नहीं हैं। हमने यह भी देखा कि दोनों वयस्क आगे बढ़ रहे थे, उनमें से एक अपने हाथों से बेचैनी से इशारे कर रहा था जबकि बच्चा पीछे-पीछे चल रहा था, जो संकट का स्पष्ट संकेत है।’ कोर्ट ने कहा कि हमें यह भी पता चला है कि बंद कमरे के अंदर बिताया गया समय पुलिसकर्मियों के लिए शिकायत में उल्लिखित कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त था, जिसे हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि किसी भी स्थिति में आपराधिक मुकदमे में साबित करना होगा।’
जबरदस्ती के रिश्ते से कर दो आजाद’
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक मुकदमों के लंबे खिंचने पर टिप्पणी करते हुए अपने एक फैसले में कहा है कि वैवाहिक मुकदमों का लंबे समय तक लंबित रहना, केवल कागजों पर शादी को हमेशा के लिए बनाए रखने जैसा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह पक्षों और समाज के हित में है कि उन मामलों में पक्षों के बीच संबंध समाप्त कर दिए जाएं, जहां मुकदमा काफी लंबे समय से लंबित है। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक संबंध को बेवजह लंबा खींचने से न केवल एक मृत रिश्ते में हताशा और बढ़ेगी, जो पहले ही सड़ चुका है और दिन-ब-दिन और भी खराब होता जा रहा है, बल्कि इससे जीवन में एक घिनौना सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और मानसिक खालीपन भी पैदा होगा। इसका परिणाम ये होगा कि व्यक्ति को फलने फूलने के लिए वह स्वतंत्र और मुक्त वातावरण नहीं मिल पाएगा, जिसकी हर इंसान अपने तन और मन से चाहत रखता है। पीठ ने कहा कि इस कोर्ट की राय है कि न्यायालय में लंबित ऐसे वैवाहिक मुकदमों को समाप्त किया जाना चाहिए और पक्षों को इस बासी और ठहरे हुए रिश्ते से मुक्ति प्रदान की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि शादी अपने कानूनी और संवैधानिक दायरे में, कभी भी सिर्फ व्यक्तिगत अधिकारों के एक अनुबंध आधारित मेल तक सीमित नहीं की जा सकती और न ही इसे वैवाहिक अधिकारों की याचिका के संकीर्ण नजरिये से ही देखा जा सकता है। यह एक बेहद निजी और सामाजिक साझेदारी है जो आपसी सम्मान, साझा उम्मीदों और समान जिम्मेदारी पर टिकी होती है। जो दो लोग शादी के बंधन में बंधते हैं, तो वे एक दूसरे पर निर्भरता का ताना-बाना बुनते हैं, जिसमें हितों के बीच लगातार संतुलन बनाए रखने की जरूरत होती है। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कर्तव्यों की पवित्रता को जान बूझकर नजरअंदाज करते हुए , सिर्फ वैवाहिक अधिकारों की पूर्ति की मांग करना, शादी जैसी संस्था के मूल सार को ही कमजोर करना है।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो क्या होगा:सुप्रीम कोर्ट