सैनिकों को दो लड़ाइयां लडऩे को मजबूर न किया जाए :चीफ जस्टिस

नई दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि देश को सैनिकों को एक साथ दो लड़ाइयां लडऩे के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। सीजेआई ने कहा एक लड़ाई सीमा पर और दूसरी अपने कानूनी अधिकारों के लिए घर पर नहीं होनी चाहिए। इसलिए सैनिकों के लिए न्याय तक बेहतर पहुंच जरूरी है।
न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने कहा जहां अदालतें सांविधानिक मूल्यों की रक्षा करती हैं। वहीं सैनिक उन परिस्थितियोंको बनाए रखते हैं जिनसे ये आदर्श कायम रह सकें। उन्होंने कहा संविधान अधिकार, गरिमा, समानता और न्याय की बात करता है। लेकिन इन वादों को बनाए रखने की परिस्थितियां सैनिक ही सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने कहा कोई भी देश स्वतंत्रता या न्याय की बात नहीं कर सकता अगर वह अपनी संप्रभुता, स्थिरता और शांति को सुरक्षित नहीं रख सकता। इस दृष्टि से अदालत और सैनिक का काम अलग-अलग होते हुए भी एक ही उद्देश्य से जुड़ा है और एक-दूसरे के पूरक हैं। सैनिकों की समस्याओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वर्दी में सेवा करने से जीवन की सामान्य परेशानियां खत्म नहीं हो जातीं और एक सैनिक को जमीन विवाद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा एक पूर्व सैनिक को सेवा या कल्याण से जुड़े अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। जबकि परिवार को पेंशन में देरी, आवास की समस्या, वैवाहिक विवाद या प्रशासनिक उदासीनता जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा देश को कभी भी अपने सैनिकों को ऐसी स्थिति में नहीं रखना चाहिए कि वे एक साथ दो लड़ाइयां लड़ें- एक सीमा पर और दूसरी अपने हक के लिए घर पर। कानून को सैनिक तक पहुंचना चाहिए क्योंकि हर बार सैनिक कानून तक नहीं पहुंच सकता। उन्होंने कहा यह केवल सहानुभूति का नहीं बल्कि सांविधानिक जिम्मेदारी का मामला है। अगर राज्य की संस्थाएं देश की रक्षा करने वालों को समय पर कानूनी मदद नहीं दे पातीं तो वे अपनी नैतिक और सांविधानिक जिम्मेदारी निभाने में पीछे रह जाती हैं। उन्होंने कहा सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। देश की संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे आपके सभी हितों की पूरी मजबूती से रक्षा करें।

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