नगर निगमों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
सीएसई की नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए
नई दिल्ली: पर्यावरण शोध संस्था ”सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट”की नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इसके मुताबिक भारतीय शहरों को प्लास्टिक कचरा साफ करने में बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है, जबकि प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियां इसका बहुत छोटा सा हिस्सा ही चुकाती हैं।
भारत में हर दिन जितना भी कचरा निकलता है, उसमें से लगभग 19,000 टन केवल प्लास्टिक होता है। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सा दूध के पैकेट, चिप्स के रैपर और आनलाइन सामान की पैकेजिंग का होता है। इस कचरे को सडक़ों से उठाने, छांटने और रिसाइकिल करने में नगर निगमों का बहुत सारा पैसा खर्च होता है। रिपोर्ट के मुताबिक पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में यह मुसीबत और ज्यादा है। धर्मशाला में पहाड़ी इलाका होने के कारण कचरा संभालने में लगभग नौ रुपए प्रति किलो का खर्च आता है, लेकिन कंपनियाँ सिर्फ एक प्रति किलो ही देती हैं। अंडमान जैसे द्वीप में यही खर्च 10 से 12 रुपए प्रति किलो तक पहुँच जाता है, जबकि इंदौर जैसे मैदानी शहरों में यह खर्च दो से चार रुपए प्रति किलो आता है। दिल्ली जैसे महानगरों की स्थिति भी बड़ी दयनीय है। पर्यावरण नियम के तहत ‘जो कचरा फैलाएगा, वही सफाई का पैसा देगा’ का सिद्धांत लागू होना चाहिए। लेकिन कंपनियां बहुत कम पैसा देकर निकल जाती हैं। कंपनियों से पूरा पैसा न मिलने की वजह से बचा हुआ घाटा नगर निगमों को जनता के टैक्स के पैसों से भरना पड़ता है। साथ ही, दिन-रात कूड़ा बीनने वाले असंगठित सफाई कर्मचारियों को भी इसका सही मेहनताना नहीं मिल पाता। सीएसई ने सुझाव दिया है कि पहाड़ों और द्वीपों जैसे कठिन इलाकों में सफाई का खर्च ज्यादा होने के कारण कंपनियों से ज्यादा पैसा लिया जाना चाहिए। कंपनियां जिस शहर या राज्य में सामान बेचती हैं, उन्हें अपने सफाई फंड का हिस्सा उसी इलाके के नगर निगम को देना चाहिए। इसके अलावा कूड़ा बीनने वाले सफाई कर्मचारियों को इस व्यवस्था से जोडक़र सीधे आर्थिक मदद दी जानी चाहिए। जब तक सामान बेचने वाली कंपनियां अपने प्लास्टिक कचरे को साफ करने का पूरा खर्चा नहीं उठाएंगी, तब तक हमारे शहर साफ नहीं हो पाएंगे और नगर निगमों पर आर्थिक बोझ बना रहेगा।
देश में रोजाना निकलता है 19 हजार टन प्लास्टिक