आज की शिक्षा छात्रों में सही चरित्र का निर्माण करने में विफल रही
चेन्नई : मद्रास उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए समाज और आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि युवा पीढ़ी रिजेक्शन स्वीकार नहीं कर पाती है। कोर्ट साल 2016 में कॉलेज की क्लास के अंदर अपनी क्लासमेट की हत्या के मामले की सुनवाई कर रहा था। इसमें उसकी सजा और आजीवन कारावास को बरकरार रखा गया है।
मद्रास हाईकोर्ट ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि कैसे कुछ पुरुषों में ‘अस्वीकृति’ बर्दाश्त न कर पाने की सनक सवार हो जाती है। इसी वजह से 2016 में एक युवा और होनहार महिला को अपनी जान चली गई। न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की पीठ ने फैसला सुनाते हुए उन गवाह छात्रों की भी कड़ी आलोचना की, जो मुकदमे के दौरान अदालत में अपने बयानों से मुकर गए थे। कोर्ट ने बेहद भारी मन से कहा कि आज की शिक्षा छात्रों में सही चरित्र का निर्माण करने में विफल रही है। अदालत ने अपने आदेश में कड़े शब्दों में कहा “यह बेहद निराशाजनक है कि जिन छात्रों ने इस खौफनाक घटना को अपनी आंखों के सामने घटते देखा, उन्होंने अदालत में आकर अपना बयान बदल दिया। हमें भारी मन से यह कहना पड़ रहा है कि इन छात्रों ने अभियोजन पक्ष का समर्थन न करके मृतक सहपाठी को निराश किया है और वे सत्य के साथ खड़े होने के अपने कर्तव्य में पूरी तरह विफल रहे।” मद्रास हाईकोर्ट ने आज के युवाओं के रवैये पर उंगली उठाते हुए कहा कि दिनदहाड़े क्लास के अंदर हुई इस वारदात के समय किसी भी छात्र ने आरोपी को पकडऩे या रोकने का प्रयास नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि अगर वे उस वक्त डर गए थे, तो कम से कम अदालत के सामने आकर सच तो बोल सकते थे। पीठ ने सोशल मीडिया पर केवल बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को कड़ा संदेश देते हुए कहा “सोशल मीडिया पर सिर्फ असहमति और विचार व्यक्त करने से कोई फायदा नहीं है, जब तक इसे असल जिंदगी में कार्रवाई में न बदला जाए।” अदालत ने कहा कि अगर युवा अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं हो सकते, तो वे असल जिंदगी में सिर्फ ‘कागजी शेर’ बनकर रह जाएंगे। जज ने कहा कि छात्रों को यह समझना होगा कि अगर वे आज चुप रहे, तो किसी भी अन्य छात्र के साथ ऐसी घटना होने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा।
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अस्वीकृति बर्दाश्त नहीं कर पाते युवा :मद्रास हाई कोर्ट