एक जमाना वह था जब प्रसव घरों में हो जाते थे। किन्तु उसे खतरनाक मानते हुये सरकार ने संस्थागत प्रसव पर जोर दिया। वर्तमान समय पर लगभग हर कोई प्रसव किसी न किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था में भी प्रसव करवाना चाहता है। किन्तु दुर्भाग्य का विषय यह है कि जिन सरकारी संस्थाओं पर भरोसा कर मरीज प्रसव के लिये भर्ती करवाये जाते हैं उनके साथ कब लापरवाही हो जाय और कब क्या हो जाय कुछ सुनिश्चित नहीं रहता। इतने बड़े संजय गांधी अस्पताल में देखा जा सकता है कि आये दिन प्रसव के दौरान होने वाली मौतों को लेकर वहां के जिम्मेदारों के खिलाफ लापरवाही के आरोप लगते हैं। फिर भी अस्पताल की व्यवस्था को देखने वाले वरष्ठि अधिकारियों को यही लगता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। कोई परेशानी नहीं है कोई अव्यवस्था नहीं है। यह स्थिति गंभीर है और चिन्ताजनक भी है। पिछले कुछ दिनों से यह भी देखा जा रहा है कि अस्पताल के गायनी विभाग में डाक्टरों के बीच घमासान मचा हुआ है। कोई नौकरी छोड़ कर भाग रहा है तो कोई नौकरी बचाने का प्रयास कर रहा है। किन्तु इस विकट समस्या के निराकरण के प्रबंधन से लेकर सरकार व विभाग के वरिष्ठ जिम्मेदारों की तरफ कोई पहल नहीं की जा रही है। जनता में क्या मैसेज जा रहा है इसकी भी कोई चिन्ता नहीं है। यह भी सही है कि संजय गांधी अस्पताल में प्रसव के लिये अधिकांश गरीब एवं मध्यम वर्ग के परिवार इस उम्मीद से पहुचते हैं कि उन्हें बेहतर सुविधायें मिलेंगी। किन्तु जब वे यहां पहुचते हैं और वातावरण देखते हैं तो उनकी सांसे फूलने लगती हैं। जो सुरक्षित घर पहुच जाते है ंवे ऊपर वाले की कूृपा मानते हैं किन्तु जो लापरवाही का शिकार होकर फंस जाते हैं वे चीखते हैं, चिल्लाते हैं, किन्तु उसका भी कोई असर नहीं होता। यह भी देखा जाता है कि यहां भर्ती होने वाली महिलाओं के प्रसव के दौरान कई तरह की समस्यायें पैदा होती हैं। यहां तक दवाओं के नाम पर भी परिजनों को परेशान होना पड़ता है। जो मरीज आयुष्मान वाले होते हैं उन्हे ंभी अपने जेब से खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा जो आयुष्मान वाले नहीं होते उन्हें तो खर्च करना ही पड़ता है। वहीं वार्ड में काम करने वाली महिला कर्मचारियों एवं नर्सो को भी सेवा शुल्क देना पड़ता है। यदि नहीं दिया जाता तो उसका दुष्प्रभाव भर्ती होने वाली महिलाओं के साथ लापरवाही बरतने के रूप में सामने आता है। ज्ञात हो कि संजय गांधी अस्पताल संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल है जहां भारी संख्या में लोग जिले व संभाग से आते हैं। ऐसी स्थिति में यहां की अव्यवस्थाओं को सुधारने के लिये युद्ध स्तर पर प्रयास होने चाहिये। विभागीय स्तर से लेकर प्रशासनिक स्तर तक एवं शासन स्तर से भी हर गतिविधियों की निगरानी व नियंत्रण होना चाहिये। मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देना चाहिये ताकि किसी को भी यहां की यातना न भोगनी पड़े।
संजय गांधी अस्पताल के मैटरनिटी विभाग में फैली अव्यवस्था