उम्मीदवारों को अपने जीवनसाथी की संपत्ति का भी करना होगा खुलासा :सुप्रीम कोर्ट


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात नगर निकाय चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों को चुनाव हलफनामे में न केवल अपनी संपत्ति, बल्कि अपने जीवनसाथी की संपत्ति का भी खुलासा करना होगा। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले का संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट की ओर से गलत कानूनी प्रावधान लागू करने की गलती एक ऐसी खामी है जिसे सुधारा जा सकता है और इससे आपराधिक कार्यवाही अपने-आप अमान्य नहीं हो जाती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने गुजरात की पूर्व नगर पार्षद चंद्रिकाबेन किशोर डफडा की अपील को आंशिक रूप से मंजूरी देते हुए ये निर्देश जारी किए। हालांकि पीठ ने आपराधिक मामले को रद्द नहीं किया। इसके बजाय, पीठ ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए के तहत मजिस्ट्रेट की ओर से संज्ञान लेने वाले आदेश को रद्द कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया, ताकि वह उचित कानूनी प्रावधानों के तहत नए सिरे से संज्ञान ले सके और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सके। पीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि उन्होंने आरोपों की सच्चाई या गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है।
चार्जशीट की प्रति नहीं मिलने मात्र से डिफॉल्ट जमानत का अधिकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को आरोप-पत्र की प्रति उपलब्ध नहीं कराए जाने को डिफॉल्ट जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक आरोपी की ऐसी ही एक याचिका खारिज कर दी गई थी। अदालत ने कहा कि पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की तरह ही बीएनएसएस के तहत भी डिफॉल्ट जमानत का अधिकार तभी उत्पन्न होता है, जब जांच एजेंसी 60 या 90 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर, जैसा भी मामला हो, चार्जशीट दाखिल नहीं करती। पीठ ने कहा “निर्धारित अवधि के भीतर बीएनएसएस की धारा के तहत निर्धारित प्रारूप में चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद डिफॉल्ट जमानत का अधिकार समाप्त हो जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *