माता-पिता की क्षति का सही आर्थिक मूल्यांकन संभव नहीं’
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट नेकहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिए जाने वाले ‘उचित मुआवजे’ का सिद्धांत केवल गणितीय आंकड़ों पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह उन लोगों को कुछ हद तक राहत और सांत्वना देने का प्रयास है, जिन्होंने अपूरणीय क्षति झेली है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने दिल्ली में वर्ष 2013 में सडक़ दुर्घटना में जान गंवाने वाले 20 वर्षीय युवक के माता-पिता को दिए गए मुआवजे में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजे का निर्धारण केवल सूखे गणितीय आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके पीछे मानवीय संवेदनाएं और परिवार की पीड़ा भी जुड़ी होती है। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति के जीवन का सटीक आर्थिक मूल्य तय करना नहीं, बल्कि पीडि़त परिवार को यथासंभव न्याय दिलाना है। पीठ ने कहा कि मृतक एक ऐसे युवा छात्र थे, जो अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत करने वाले थे। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर मुआवजा कम करना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा। अदालत ने माना कि माता-पिता की क्षति का सही-सही आर्थिक मूल्यांकन संभव नहीं है और दिया गया मुआवजा उचित मुआवजे की सीमा से बाहर नहीं जाता। अदालत ने यह भी कहा कि मुआवजा तय करते समय यह मान लेना उचित नहीं होगा कि किसी युवा को भविष्य में निश्चित रूप से असाधारण पेशेवर सफलता मिलती। साथ ही, उसकी तुलना अन्य सफल पेशेवरों के वेतनमान से भी नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी युवा जीवन की कीमत और उसके परिवार की पीड़ा को पैसों में पूरी तरह नहीं आंका जा सकता। इसलिए उचित मुआवजा का निर्धारण पूर्ण गणितीय सटीकता के साथ संभव नहीं है। पीठ ने यह भी माना कि मृतक अविवाहित था, इसलिए उसके माता-पिता ‘फिलियल कंसोर्टियम’के तहत अतिरिक्त मुआवजे के हकदार हैं। अदालत ने दोनों माता-पिता को 40-40 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया। इसके साथ ही कुल मुआवजा राशि 81,21,900 रुपये से बढ़ाकर 82,01,900 रुपये कर दी गई। यह राशि अधिकरण द्वारा निर्धारित ब्याज के साथ अदा की जाएगी।
युवा जीवन की कीमत और परिवार की पीड़ा की भरपाई पैसे नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट