नई दिल्ली : भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि संविधान कुछ खास और संपन्न लोगों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक का समान अधिकार है। उन्होंने कहा कि संविधान केवल उन लोगों के लिए नहीं है जो महंगी कानूनी प्रक्रिया का खर्च उठा सकते हैं और बड़े वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं।
चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान सच मायनों में सबका साझा घर है। यह केवल जजों, वकीलों या सरकारी संस्थाओं का नहीं, बल्कि हर नागरिक का है, चाहे वह शहर में रहने वाला हो, गांव का निवासी हो, गरीब हो या समाज के हाशिये पर खड़ा व्यक्ति। चीफ जस्टिस ने कहा कि लोग न्याय पाने और संविधान के वादों पर भरोसा करने के लिए इसकी ओर देखते हैं। संविधान सिर्फ दूर बैठकर समाज को नियंत्रित करने वाला कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन और लोकतंत्र के चरित्र में मौजूद रहता है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सीजेआई को पत्र
चीफ जस्टिस को 72 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और कानूनी कार्यकर्ताओं के समूह ने खुला पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी को वापस लेने की मांग की है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 11 मई को सुनवाई के दौरान कहा था हमें इस देश की एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जहां कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं। पत्र में कहा कि इस तरह की टिप्पणियां पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी दायरे में काम कर रहे नागरिकों, समुदायों और समूहों पर अनुचित सवाल खड़े करती हैं। पत्र में कहा, नागरिकों को वैधानिक जिम्मेदारियों के पालन के लिए आवाज उठाने वाले पक्षकारों के बजाय कथित पर्यावरण कार्यकर्ता कहना उचित नहीं है।
संविधान कुछ खास लोगों की जागीर नहीं है: चीफ जस्टिस