यूएपीए के मामलों में भी जमानत एक नियम होना चाहिएसुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद को जमानत न देने वाले फैसले का जिक्र किया है। कोर्ट ने माना कि आरोपी को जमानत देना नियम है और जेल भेजना अपवाद होना चाहिए। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 2021 के उस फैसले का जिक्र किया जिसमें माना गया था कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालत यूएपीए मामलों में भी जमानत दे सकती है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज करते समय इस फैसले पर अदालत द्वारा ध्यान नहीं दिया गया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई बड़ी बेंच फैसला देती है, तो छोटी बेंच को उसका पालन करना होता है। हालांकि आजकल ऐसा देखने को मिल रहा है कि छोटी बेंच सीधे-सीधे किसी बड़े फैसले को खारिज नहीं करती, लेकिन ऐसे फैसले जरूर सुनाती है जिनसे बड़ा फैसलों का असर कमजोर पड़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के मामलों में भी जमानत एक नियम होना चाहिए और जेल एक अपवाद. इसके साथ ही अदालत ने 2020 के दिल्ली दंगा मामले में कार्यकर्ता उमर खालिद को जमानत न देने वाले एक अन्य पीठ के पुराने फैसले पर असहमति जताई. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इसलिए किसी आरोपी के तेजी से मुकदमा चलने के अधिकार को नहीं छीना जा सकता क्योंकि उस पर इस कड़े आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज है. पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्हें गुलफिशा फातिमा मामले के फैसले पर गंभीर आपत्ति है. पीठ ने कहा कि नजीब मामले के मुख्य संदेश और महत्व को इस तरह कम किया जाना ही उसकी चिंता का विषय है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि ‘नजीब मामले’ को बड़े नजरिए से देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ समय बीतने के आधार पर ही, अगर परिस्थितियां वैसी हों-आरोपी को यांत्रिक रूप से जेल से रिहा होने का अधिकार मिल जाता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *