चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए:जस्टिस नागरत्ना


सांविधानिक संस्थाओं पर दबाव घातक
पटना: सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए और उस पर किसी भी तरह का राजनीतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे संवैधानिक संस्थाओं को भी अपनी गरिमा बनाकर रखनी चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा यदि संवैधानिक ढांचा धीरे-धीरे कमजोर होता है तो इससे संवैधानिक ब्रेकडाउन की स्थिति पैदा हो सकती है, भले ही अधिकार औपचारिक रूप से मौजूद रहें।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जब संस्थाएं एक-दूसरे की जांच और निगरानी करना बंद कर देती हैं तभी असली समस्या शुरू होती है। चुनाव आयोग, कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया और वित्त आयोग जैसी संस्थाएं निष्पक्ष व्यवस्था बनाए रखने में जरूरी भूमिका निभाती हैं। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया पर कहा कि हमारे लोकतंत्र में समय पर चुनाव होने से सरकारें सही तरीके से बदलती रहती हैं। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का मतलब राजनीतिक मुकाबले के नियमों को अपने हाथ में लेना है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ पब्लिक सेक्टर की संस्थाओं में कम से कम 30 फीसदी लॉ ऑफिसर महिलाएं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पब्लिक सेक्टर के संगठनों में भी 30 फीसदी पैनल एडवोकेट महिलाएं होनी चाहिए। जस्टिस बी वी नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि महिला वकीलों को एक्टिव प्रैक्टिस में बने रहने में मदद करने के लिए कानूनी भागीदारी बहुत ज़रूरी है। जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि महिलाओं की कम भागीदारी दोहरी भूमिका से जुड़ी है, जो उन्हें निभानी पड़ती है। उन्होंने बताया कि मुश्किल कानूनी करियर के साथ घर की जि़म्मेदारियों को बैलेंस करने में महिलाएं भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा “एक महिला दोहरी भूमिका निभाती है। उसे अपना घर भी देखना होता है। इससे अक्सर एक सफल कानूनी प्रैक्टिस बनाने के लिए जरूरी समय और कंटिन्यूटी कम हो जाती है।” जस्टिस नागरत्ना ने कहा “जब एक सफल आदमी की बात आती है तो उसके पीछे हमेशा एक औरत होती है। लेकिन जब एक सफल औरत की बात आती है तो उसके पीछे एक परिवार होता है।” जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि कई महिला वकीलों को प्रेग्नेंसी, बच्चों की देखभाल और परिवार की जि़म्मेदारियों के कारण अक्सर अपने करियर के ज़रूरी पड़ावों पर, एक्टिव प्रैक्टिस से दूर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा “कई बार उन्हें बीच में ही प्रोफेशन छोडऩा पड़ता है और वे काफी केस के साथ प्रोफेशन में वापस नहीं आ पातीं। ऐसी रुकावटें सीधे कोर्टरूम में उनकी विजि़बिलिटी पर असर डालती हैं, जो लीगल सिस्टम में प्रोफेशनल पहचान और तरक्की के लिए एक ज़रूरी फैक्टर है।

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