कोर्ट में जमा पैसे और ब्याज के नियमों में होगा बड़ा बदलाव
जमा पैसों के लिए एक समान व्यवस्था बनाने को कहा
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कानून आयोग से अपीलों के दौरान अदालतों और ट्रिब्यूनल में जमा किए जाने वाले पैसे के लिए एक समान व्यवस्था की आवश्यकता की जांच करने को कहा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी राशि को ‘जमा’ करना ‘भुगतान’ करने के बराबर नहीं है.जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि अदालत में राशि जमा करने और देनदारी से अंतिम रूप से मुक्त होने के बीच कई तरह की संभावनाएं होती हैं, जिनके साथ उतनी ही अनिश्चितता भी जुड़ी रहती है.
पीठ ने अपने फैसले में कहा इस तरह के विवाद चिंताजनक रूप से लगातार सामने आते रहते हैं, फिर भी मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 अपने मौजूदा स्वरूप में सशर्त जमा और उस पर ब्याज मिलने के बीच के संबंध पर कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं देता है. इस कमी या खामी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.” पीठ ने कानून आयोग को इस मुद्दे की जांच करने, अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय व कानून और न्याय मंत्रालय से परामर्श करने का निर्देश दिया. पीठ ने कहा कि किसी भी जमा राशि की पारदर्शिता को बनाए रखने और उस पर ब्याज देने के लिए, उस जमा राशि को संभालने के तौर-तरीकों और व्यवस्था में स्पष्टता व एकरूपता होनी चाहिए. कोर्ट में जमा की गई राशियों को संभालने की प्रक्रिया में मानकीकरण की कमी, समय के साथ पैसे के मूल्य के इस आवश्यक अंतर्निहित सिद्धांत के साथ-साथ एक निश्चित और स्पष्ट तरीके से ब्याज के संचय को भी कमजोर करती है. पीठ ने कहा कि इस मामले में सामने आने वाले विवाद इतनी बार होते हैं कि अपीलों के लंबित रहने के दौरान ऐसी जमा राशियों, उनके निवेश और उन पर मिलने वाले ब्याज के समायोजन के लिए एक स्पष्ट और अधिक समान दृष्टिकोण अपनाना बेहद आवश्यक हो जाता है. पीठ ने कहा कि एक सुसंगत और मानक नियम विकसित करना आवश्यक है. जिसके द्वारा अपील के निपटारे तक डिक्री राशि को अदालतों/ट्रिब्यूनल में जमा किया जाए और मामलों के अंतिम फैसले के समय उस पर जमा हुए ब्याज का हिसाब-किताब करने का तरीका तय हो. पीठ ने कहा”जमा की गई राशि डिक्री-धारकके हितों को सुरक्षित करे और डिक्री राशि पर बढ़ती ब्याज देनदारी के मामले में जजमेंट-डेटर के हितों की भी रक्षा करे, और एक ऐसा मानक सिद्धांत हो जिसके द्वारा अंतिम निपटारे के समय ऐसी जमा राशियों और उन पर अर्जित ब्याज को समायोजित किया जा सके.”

