इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए नाबालिग बाध्य नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग लडक़ी को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन कराने की अनुमति देते हुए कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला, विशेषकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि जन्म लेने वाले बच्चे की अपेक्षा गर्भवती महिला की इच्छा अधिक महत्त्वपूर्ण है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ऐसी गर्भावस्था जारी रहने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा की संभावनाओं, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। पीठ ने कहा, ‘अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार विशेषकर प्रजनन के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। यह अधिकार अव्यावहारिक प्रतिबंध लगाकर निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता, खासकर नाबालिगों और अवांछित गर्भावस्था जैसे मामलों में।’ न्यायालय ने कहा, ‘किसी भी अदालत को किसी महिला और विशेष रूप से नाबालिग बच्ची को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक ढोने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। ऐसा करना न केवल उसकी निर्णय लेने की स्वतंत्रता की अनदेखी होगी, बल्कि यदि उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाए तो उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंचेगा।’पीठ ने कहा कि राहत देने से इनकार नाबालिग को अपरिवर्तनीय परिणाम झेलने के लिए मजबूर करेगा और ऐसा दृष्टिकोण प्रजनन विकल्प को मौलिक अधिकार मानने वाले संवैधानिक तथा स्थापित सिद्धांतों के विपरीत होगा। न्यायालय ने कहा कि गर्भवती महिला की इच्छा अधिक महत्त्वपूर्ण है, न कि जन्म लेने वाले बच्चे की। पीठ ने कहा, ‘यह कहना आसान है कि यदि गर्भवती महिला बच्चे का पालन-पोषण नहीं करना चाहती तो वह उसे गोद दे सकती है, इसलिए उसे बच्चे को जन्म देना ही चाहिए। लेकिन यह विचार विशेषकर उन मामलों में स्वीकार्य नहीं हो सकता, जहां जन्म लेने वाला बच्चा अवांछित हो।’ उसने कहा, ‘ऐसी स्थिति में महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध बच्चे को जन्म देने और गर्भावस्था जारी रखने का निर्देश देना गर्भवती महिला के कल्याण को नकारना होगा और उसे अभी जन्म न लेने वाले बच्चे के हितों के अधीन कर देगा।’पीठ ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को ऐसे मामलों में जन्म लेने वाले बच्चे के बजाय गर्भवती महिला के कल्याण को ध्यान में रखते हुए परिस्थितियों का मूल्यांकन करना चाहिए। न्यायालय ने कहा संवैधानिक अदालत को उन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को उस पक्ष के दृष्टिकोण से देखना चाहिए, जो गर्भसमापन चाहती है और चिकित्सकीय जोखिम उठाने को तैयार है न कि गर्भावस्था पूरी कर अवांछित बच्चे को जन्म देने का निर्देश देना चाहिए। पीठ ने कहा यदि संवैधानिक अदालत यह कहे कि अवांछित गर्भावस्था भी जारी रखनी होगी, तो अनुमति लेने के लिए अदालत आने के बजाय लोग अवैध गर्भपात केंद्रों का रुख करेंगे या गुप्त रूप से गर्भसमापन कराएंगे, जिससे गर्भवती महिला को अधिक खतरा होगा।
सेवा ईनाम वक्फ संपत्ति का हिस्सा होती हैं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि मस्जिदों से जुड़ी जिन जमीनों को ”सेवा ईनाम” कहा जाता है, वे वक्फ संपत्ति का हिस्सा होती हैं और उन्हें बेचा नहीं जा सकता। शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश के एक मामले में फैसला देते हुए कहा कि यह बात निर्विवाद है कि धार्मिक या धर्मार्थ कामों के लिए ”सेवा इनाम” के तौर पर दी गई जमीनें दान की गई संपत्ति का रूप ले लेती हैं और उन पर एक सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार हो जाता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को देने पर रोक लग जाती है। न्यायमूर्ति एमएम सुंद्रेश और एजी मसीह की पीठ ने आंध्रप्रदेश वक्फ बोर्ड की अपील पर यह फैसला सुनाते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला रद कर वक्फ ट्रिब्युनल के फैसले को बहाल कर दिया है।

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