भारत एक अस्तित्व और सभ्यतागत पहचान का नाम :भागवत


भारत का उदय विश्व में शांति और समृद्धि लाएगा
नई दिल्ली :राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भारत का विश्वगुरु के रूप में उभार उसकी सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य दुनिया में शांति और समृद्धि लाना होना चाहिए। भागवत ने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता है जिसने आक्रमणों, विदेशी शासन और ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों के बावजूद अपनी पहचान बनाए रखी है।
मोहन भागवत ने कहा “गंगा हजारों वर्षों से बह रही है। वह प्राचीन है, लेकिन उसमें बहने वाला जल हमेशा नया होता है। गंगा शाश्वत भी है और निरंतर नवीन भी। भारत भी शाश्वत है और निरंतर नवीन है। भारत केवल एक भूभाग का नाम नहीं है। भारत एक अस्तित्व और सभ्यतागत पहचान का नाम है।” भागवत ने कहा कि भारत की प्रगति का लाभ केवल देश को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को मिलेगा। उन्होंने कहा “जब भारत उठता है तो केवल भारत को लाभ नहीं होता। जब भारत आगे बढ़ता है तो दुनिया में शांति और सुख का प्रसार होता है। एक प्रयास से तीन उद्देश्यों की पूर्ति होती है- व्यक्ति का कल्याण, राष्ट्र का कल्याण और आने वाली पीढिय़ों का कल्याण।” देश के भविष्य को लेकर विश्वास जताते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में उभर सकता है। भागवत ने कहा, “मेरा मानना है कि अगले 20 से 30 वर्षों में भारत दुनिया का नंबर एक राष्ट्र बनेगा। भारत विश्वगुरु बनेगा। वह शक्तिशाली बनेगा, लेकिन अपनी शक्ति का उपयोग विश्व कल्याण के लिए करेगा। भारत मानवता का मार्गदर्शक बनेगा। यही हमारी परिकल्पना है।” उन्होंने कहा कि भारत को अपनी युवा पीढ़ी को सेवा, देशभक्ति और चरित्र जैसे मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार करना होगा। उन्होंने कहा “आने वाली पीढ़ी सेवा, देशभक्ति और चरित्र के मूल्यों को आगे बढ़ाएगी। हमें अपने जीवन और आचरण से उन्हें मार्ग दिखाना होगा।” “भारत को नहीं करनी चाहिए अन्य देशों की नकल
भागवत ने कहा कि भारत को अन्य देशों की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर भारत महाशक्ति बनकर अमेरिका या अन्य शक्तिशाली देशों की तरह व्यवहार करने लगे, तो वह भारत नहीं रहेगा। जब भारत जागृत और सक्षम बनता है, तब दुनिया में शांति और सुख आता है। लोगों के बीच संबंध अधिक सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण बनते हैं।”उन्होंने कहा कि समृद्धि कुछ हाथों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने कहा,”हमें भरपूर समृद्धि पैदा करनी चाहिए। अधिशेष का निर्माण करना चाहिए। लेकिन वह समृद्धि सभी के हाथों तक पहुंचनी चाहिए। भागवत ने कहा कि ईमानदार मेहनत और शारीरिक श्रम को समाज में अधिक सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा, “कड़ी मेहनत का सम्मान होना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *