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परिवार भी हो जाता है बर्बाद
छोटी गलतियों पर बर्खास्तगी का फैसला न लें
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेवा न्यायशास्त्र में नौकरी से बर्खास्तगी सबसे गंभीर सजा है. इसका न केवल कर्मचारी पर बल्कि उनके आश्रितों पर भी बेहद बुरा असर पड़ता है. शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसा कोई भी जुर्माना या सजा लगाने से पहले अनुशासनात्मक प्राधिकरण को लापरवाही या कदाचार की प्रकृति और गंभीरता, सेवा की अवधि, पुराना रिकॉर्ड, उम्र और क्या नियोक्ता को कोई वित्तीय नुकसान हुआ है, जैसे कारकों पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन के सिंह की पीठ ने कहा कि नौकरी से बर्खास्तगी आमतौर पर वहीं सही मानी जाती है, जहां कदाचार इतना गंभीर हो कि कर्मचारी को नौकरी पर बनाए रखना पूरी तरह से अनुशासन, विश्वास या संस्था के कामकाज के खिलाफ हो. पीठ ने साफ किया कि भ्रष्टाचार, अवैध उगाही, नैतिक पतन, पैसों का गबन, नियोक्ता को भारी नुकसान पहुंचाने वाले काम, या नौकरी पर बने रहने के लिए पूरी तरह से अयोग्यता दिखाने वाले मामलों का आधार अलग होता है. पीठ ने कहा “हालांकि जहां कदाचार में भ्रष्टाचार, नैतिक पतन, वित्तीय गबन या नियोक्ता को हुआ कोई साबित नुकसान शामिल नहीं है, और जहां बिना किसी बड़े दाग के लंबी सेवा रही हो, वहां अनुशासनात्मक प्राधिकरण को सावधानीपूर्वक यह जांचना चाहिए कि क्या कोई कम सजा न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगी.”पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि सेवा न्यायशास्त्र में नौकरी से बर्खास्तगी सबसे कठोर सजा है, जो किसी दोषी कर्मचारी को दी जा सकती है. यह नियोक्ता और कर्मचारी के रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर देती है, और आमतौर पर कर्मचारी को उसकी पिछली सेवा के लाभों, जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों से भी वंचित कर देती है. इससे न केवल कर्मचारी की मौजूदा कमाई का जरिया छिन जाता है, बल्कि उस पर निर्भर परिवार के सदस्यों की आजीविका भी बंद हो जाती है.
नौकरी से बर्खास्तगी सबसे बड़ी सजा: सुप्रीम कोर्ट