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इंदौर। बाल विवाह से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने न सिर्फ पीडि़ता को राहत दी बल्कि बाल विवाह कराने वाले माता-पिता पर भी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह कराने वाले माता-पिता अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। पति आर्थिक संकट में है तो उसे उन अभिभावकों की सहायता लेनी चाहिए जिन्होंने उसका बाल विवाह करवाया।
कोर्ट ने आदेश में यह भी कहा कि कम उम्र में शादी कराकर लडक़ी को पहले बाल विवाह का शिकार बनाया गया और फिर बाद में उसे मामूली भरण-पोषण देकर दोबारा पीडि़त किया जा रहा है। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पति की यह बात कि विवाह के समय पत्नी नाबालिग थी सही मान भी ली जाए तो यह स्पष्ट है कि पत्नी बाल विवाह की शिकार रही है। कोर्ट ने कहा कि रीति-रिवाज की आड़ में उसे दोबारा प्रताडि़त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में पत्नी को दी जा रही दो हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने भरण पोषण की राशि बढ़ाकर छह हजार रुपये प्रतिमाह करने का आदेश दिया। यह राशि पति को अगस्त 2021 से देना होगी।
गर्भपात की अनुमति से किया इनकार
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीइ ने दुष्कर्म पीडि़ता की गर्भावस्था 31 सप्ताह से अधिक होने के कारण गर्भपात की अनुमति देने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह इस प्रकृति का कोई निर्देश जारी करने के पक्ष में नहीं है। लिहाजा, याचिका निरस्त की जाती है। कोर्ट ने याचिका निरस्त करते हुए अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता भी नहीं चाहती थी कि न्यायालय ऐसा कोई निर्देश जारी करे। सुनवाई के दौरान उसने न्यायालय को इस बारे में सूचित किया था। मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टें अपने आप में सब कुछ स्पष्ट कर देती हैं। बच्चे का जन्म जीवित अवस्था में होता है, तो राज्य उस बच्चे की पूरी देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
बाल विवाह कराने वाले माता-पिता जिम्मेदारी से नहीं बच सकते :हाई कोर्ट