मेरे जीवन के हर उत्थान-पतन में महाप्रभु ही मेरे संबल रहे
नई दिल्ली : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि बचपन से ही मेरा श्रीजगन्नाथ महाप्रभु से गहरा आध्यात्मिक संबंध रहा है। उनके भजन, प्रार्थनाएं और महिमा सुनते-सुनते मेरे मन में उनके प्रति अटूट श्रद्धा जागी। भजन गाते हुए मुझे सदैव ऐसा अनुभव होता था कि महाप्रभु मेरे साथ हैं और जीवन की हर विपत्ति में मेरा मार्गदर्शन करते हैं। विपदा-आपदा में मेरी मदद करते हैं। भक्तकवि मधुसूदन राव का गीत आज भी मैं मन ही मन गाती हूं- मैं कुछ समझने-बूझने की उम्र में पहुंचने तक जगन्नाथजी को जानने लगी थी। हमारे घर में अक्सर जगन्नाथजी की चर्चा होती थी। भुवनेश्वर में पढ़ाई के दौरान पहली बार पुरी जाकर महाप्रभु के दर्शन किए।
िराष्ट्रपति ने कहा कि मेरे जीवन के हर उत्थान-पतन में महाप्रभु ही मेरे संबल रहे हैं। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार घोषित होने पर भी सबसे पहले मैंने उन्हीं का स्मरण किया और उनके आशीर्वाद की प्रार्थना की। शपथ ग्रहण से लेकर अपने प्रथम संबोधन तक मुझे निरंतर उनकी उपस्थिति और कृपा का अनुभव होता रहा। राष्ट्रपति बनने के बाद जब लंबे समय तक पुरी नहीं जा सकी, तो मन व्याकुल रहा। अंतत: 10 नवंबर, 2022 को पुरी पहुंचने का अवसर मिला। बड़दांड पर पहुंचते ही मैंने प्रोटोकॉल त्यागकर नंगे पांव श्रीमंदिर तक चलने का निश्चय किया। श्रीमंदिर लगभग दो किमी दूर था। मंदिर के नीलचक्र और पतित पावन-ध्वज को देखते हुए मैं आगे बढ़ती चली गई। सिंहद्वार पर पहुंचकर पावन धूल में साष्टांग प्रणाम किया और गर्भगृह में महाप्रभु के दर्शन कर भाव-विभोर हो उठी। बारह महीने में तेरह पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं श्रीक्षेत्र में, लेकिन रथयात्रा की छटा तो निराली होती है। पूरे वर्ष भक्तगण यहां आकर महाप्रभु का दर्शन करते हैं। किंतु वर्ष में एक बार महाप्रभु अपने भव्य मंदिर से बाहर विशाल पथ पर आते हैं। भक्तों को दर्शन देते हैं। तीन रथ पर तीन ठाकुर बैठकर चक्रराज सुदर्शन के साथ गुंडिचा मंदिर की ओर यात्रा करते हैं। वहां सात दिनों तक रहकर वापस लौट आते हैं। महाप्रभु का यह महापर्व अतुलनीय है। मेरे जीवन के हर उत्थान-पतन में महाप्रभु ही मेरे संबल रहे हैं।
बचपन से ही मेरा श्रीजगन्नाथ महाप्रभु से गहरा आध्यात्मिक संबंध : राष्ट्रपति