न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने कॉलेजियम ही बेहतर: पूर्व सीजेआई

कार्यपालिका को न्यायिक आदेशों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए
बंगलुरु : पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन मेंकहा कि भले ही कॉलेजियम सिस्टम पूरी तरह सही न हो, लेकिन मौजूदा परिस्थिति में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए यह सबसे उपयुक्त है। मैं यह नहीं कहूंगा कि कॉलेजियम सिस्टम एक फुलप्रूफ व्यवस्था है। दुनिया में कोई भी सिस्टम पूरी तरह से परफेक्ट नहीं हो सकता। हर व्यवस्था के अपने गुण और दोष होते हैं। लेकिन इतने वर्षों के अनुभव के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि भारत के लिए फिलहाल यही सिस्टम सबसे बेहतर है।”
जस्टिस गवई ने समझाया कि न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम जज करते हैं। इसके बाद केंद्र सरकार, इंटेलिजेंस ब्यूरो और अन्य विभाग अपनी रिपोर्ट देते हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा कि सरकार की आपत्तियों पर कॉलेजियम गंभीरता से विचार करता है और उसके बाद ही अंतिम फैसला लिया जाता है। गवई ने जजों की नियुक्ति में होने वाली देरी को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि यदि कॉलेजियम किसी नाम को दोबारा भेजता है, तो सरकार उसे नियुक्त करने के लिए बाध्य है। उन्होंने कहा “मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि कई नाम ऐसे हैं जिन्हें दूसरी बार भेजे जाने के बाद भी सरकार ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है। मैं किसी पर आरोप नहीं लगा रहा, लेकिन इस गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है।”उन्होंने कहा “जब कार्यपालिका अपनी पूरी ताकत के साथ किसी आरोपी के घर पर सिर्फ शक के आधार पर बुलडोजर चला देती है तो क्या न्यायपालिका को मूकदर्शक बने रहना चाहिए? क्या कार्यपालिका को कानून की धज्जियां उड़ाने की इजाजत देनी चाहिए?” उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत’ का सपना कानून से ही पूरा हो सकता है। पूर्व सीजेआई ने कहा कि न्यायपालिका को दोष देना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को उसकी सजा का 70 प्रतिशत समय काटने के बाद जमानत मिलती है, तो सरकार रूटीन तौर पर उसे चुनौती क्यों देती है? उन्होंने सरकार से ‘नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी’ को तुरंत लागू करने की अपील की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *