सरकारी कर्मचारी को बर्खास्तगी की सजा मौत की सजा से कम नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी के लिए सेवा से बर्खास्तगी की सजा मौत की सजा से कम नहीं है। अदालत ने तमिलनाडु की पेरियार यूनिवर्सिटी के उप-पंजीयक आर. सरवणन को बड़ी राहत देते हुए उनकी सेवा बहाल करने का आदेश बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने आदेश में कहा कि नौकरी से बर्खास्तगी या सेवा से हटाना सरकारी कर्मचारी के लिए सबसे कठोर सजा है। इसका असर केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार पर भी पड़ता है। ऐसी सजा से कर्मचारी अपनी नौकरी और उससे जुड़े लाभ खो सकता है और आर्थिक रूप से बेसहारा हो सकता है। अदालत ने कहा कि इतने गंभीर परिणामों वाले मामलों में हाईकोर्ट केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता। उचित मामलों में उसे हस्तक्षेप करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक एक सदस्यीय आयोग के सामने सरवणन के खिलाफ कोई दस्तावेज या जरूरी सबूत पेश नहीं किए गए। इसके बावजूद उन्हें दोषी ठहरा दिया गया और सेवा से हटा दिया गया। अदालत ने कहा कि जांच रिपोर्ट में निकाले गए निष्कर्ष अनुमान और अटकलों पर आधारित थे। ऐसे निष्कर्षों के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले में दखल देने के लिए कोई ठोस और उचित कारण नहीं बताया। अदालत के अनुसार, विश्वविद्यालय के अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने भी आयोग की रिपोर्ट स्वीकार करते समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उसके निष्कर्षों के समर्थन में कानूनी रूप से मान्य सबूत नहीं थे।अदालत ने स्पष्ट किया कि वैकल्पिक उपाय अपनाने का नियम सुविधा के लिए है, कोई कठोर प्रतिबंध नहीं। जब किसी कर्मचारी को बिना कानूनी सबूत के सजा दी जाती है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
रिश्वतखोरी की जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं
उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत, किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा कथित तौर पर रिश्वत मांगने के मामले की जांच के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह कृत्य आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़ा हुआ नहीं है। न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। इस फैसले के जरिए पीठ ने राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी। निर्णय में कहा गया कि धन का दुरुपयोग, खातों में हेराफेरी, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और रिश्वत लेने जैसे अपराध इस प्रावधान के दायरे से बाहर हैं। हालांकि शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कानून बनाने वाली संस्था का मकसद धारा 17ए को कानून में शामिल करके लोक सेवक को मुकदमे से बचाना था। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इस धारा को सर्वव्यापी नहीं माना जा सकता, निर्णय में कहा गया है भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के प्रावधान लागू होने के लिए, किसी लोक सेवक द्वारा कोई निर्णय लिया जाना या अनुशंसा आवश्यक है, जिनके खिलाफ जांच या पूछताछ शुरू की जानी है। इसमें कहा गया है इस तरह का निर्णय या अनुशंसा, किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का पालन करते समय लिया गया निर्णय या की गई अनुशंसा होगी।
