शिक्षकों पर आपराधिक मुकदमे से स्कूलों के कामकाज पर पड़ेगा असर
कोच्चि : केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि कक्षा में अनुशासन बनाए रखने या बच्चे को सुधारने के लिए शिक्षक की ओर से उठाए गए मामूली कदमों के आधार पर उसे आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने पांचवीं कक्षा की एक छात्रा को मामूली चोट लगने के मामले में शिक्षिका के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
जस्टिस जॉबिन सेबेस्टियन की पीठ ने कहा कि शिक्षक बच्चों के चरित्र, व्यवहार और भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज्ञान देने के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारी विद्यार्थियों को सही दिशा दिखाना, उनकी गलतियों को सुधारना और अनुशासन सिखाना भी है। इस जिम्मेदारी को निभाने में शिक्षक की भूमिका माता-पिता जैसी होती है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि कोई शिक्षक दुर्भावना से बच्चे को शारीरिक दंड देता है और इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य या भविष्य पर गंभीर असर पड़ सकता है, तो ऐसे मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। हालांकि, मौजूदा मामले में जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों से यह नहीं पता चला कि शिक्षिका ने बच्ची को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया था। हाई कोर्ट ने कहा कि केवल अनुशासन बनाए रखने या बच्चे को सुधारने के लिए उठाए गए मामूली कदमों के आधार पर किसी शिक्षक को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक अगर सामान्य अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामलों में शिक्षकों के खिलाफ जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत आपराधिक मामले चलाए जाने लगें, तो इससे शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासन और उनके व्यवस्थित कामकाज पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि दुर्भावना से दी गई शारीरिक सजा या बच्चे को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने के मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

