छूटे नामों के लिए अब घर-घर जाएंगे बीएलओ
आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं
नई दिल्ली:एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों पर चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों ने एक बैठक की। कहा गया कि कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र आयोग या आईटी डिवीजन के किसी पॉलिसी मामले से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग में डेपुटेशन पर आए एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था। संबंधित अधिकारी की ओर से जारी काम के बंटवारे के आदेश असल में दो आयुक्तों के आदेशों के बाद लागू नहीं किए गए थे।
चुनाव आयोग ने कहा चल रहे एसआईआर के दौरान, जिन लोगों को अनमैप्ड होने या लॉजिकल विसंगतियों के कारण नोटिस भेजा गया है, बीएलओ उनके घर जाकर डाक्यूमेंट इक_ा करेंगेे। ऐसे लोगों को सुनवाई के लिए ऑफिस बुलाने की जरूरत नहीं है। सुनवाई अधिकतर ऑनलाइन होगी। अगर जरूरत हो तो वोटर अपनी तरफ से सुनवाई में शामिल होने के लिए परिवार के किसी भी बालिग सदस्य को अधिकृत कर सकता है। ऑनलाइन सुनवाई की सुविधाओं को बेहतर बनाया जाएगा। जिला चुनाव अधिकारी जरूरत के हिसाब से नाइट शेल्टर में रहने वाले लोगों, मजदूरों, गरीबों, बेघरों आदि के लिए काफी संख्या में हेल्प डेस्क बनाएंगे या स्पेशल कैंप लगाएंगे। अगर फील्ड अधिकारियों को और छूट की जरूरत होती है, तो उसे लागू किया जाएगा। आयोग ने 20 राज्य में छूटे नामों के लिए भी विशेष अभियान चलाने को कहा। उन्होंने कहा, “बिहार और पश्चिम बंगाल समेत 20 राज्यों केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर का काम पहले ही पूरा हो चुका है। कोई भी व्यक्ति जिसका नाम एसआईआर के दौरान या उसके बाद छूट गया हो अपना नाम शामिल करवाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। पिछले कुछ दिनों से देश के तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के कामकाज की जांच-पड़ताल हो रही है। दो चुनाव आयुक्तों ने 10 माह से कम से कम 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई थीं। आयोग ने इस पर जवाब देते हुए कहा कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और टिप्पणियों विचार-विमर्श की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा थीं।
चुनाव आयोग कुछ भी साफ नहीं कर रहा : पूर्व लोकसभा महासचिव
लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी विषय पर आम सहमति संभव न हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर ही लिया जाना चाहिए. चुनाव आयोग के बयान का जिक्र करते हुए निष्कर्ष के तौर पर उन्होंने कहा “चुनाव आयोग को और अधिक स्पष्टता देनी चाहिए थी, लेकिन वह कुछ भी साफ नहीं कर रहा है. उन्होंने जनता के मन में उठ रहे संदेहों और आशंकाओं को दूर नहीं किया है. उन्होंने केवल कानून और संविधान के संबंध में सामान्य स्थिति की बात कह दी है. इसलिए, चुनाव आयोग की तरफ से एक वास्तविक स्पष्टीकरण आना अभी बाकी है.” लोकसभा के पूर्व महासचिव ने कहा “फैसले बहुमत से लिए जाने चाहिए. अगर आम सहमति बनना संभव न हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर ही लिया जाना चाहिए.”
