स्थिति रिपोर्ट से सामने आने वाली पूरी तस्वीर बेहद गंभीर
मेरठ में सील होंगी 16,726 संपत्तियां
अनधिकृत निर्माण गिराने के निर्देश
नई दिल्ली: : अवैध निर्माण और आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर गंभीर रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को मेरठ में 16,726 संपत्तियों को सील करने और अनधिकृत निर्माणों को गिराने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा “हम यह जानकर स्तब्ध और परेशान हैं कि स्थिति रिपोर्ट पढऩे पर पता चलता है कि उल्देपुर में सैकड़ों अवैध आवासीय कॉलोनियां विकसित हो गई हैं।”
पीठ ने कहा “इस प्रक्रिया में पहला कदम कब्जाधारियों से परिसर खाली करने के लिए कहना और इन सभी परिसरों यानी 16,726 अवैध निर्माणों को सील करना है। हम इसी का निर्देश देते हैं।” अदालत ने कहा कि संभव है कि इनमें से कुछ निर्माण जर्जर स्थिति में हों और उनके गिरने से लोगों की जान जा सकती है। पीठ ने कहा कि वह किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं चाहती और इसलिए तत्काल कार्रवाई जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने चारों जोन में भी तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि अगर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से किसी घटना में निर्दोष लोगों की जान जाती है तो इसके लिए जिम्मेदार सरकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा। पीठ ने कहा “स्थिति रिपोर्ट से सामने आने वाली पूरी तस्वीर बेहद गंभीर है। अधिकारियों को इन अनधिकृत निर्माणों को गिराने के लिए दिन-रात काम करने की जरूरत है।” स्थिति रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों को चिंताजनक बताते हुए अदालत ने कहा, “पूरे शहर और बाहरी इलाकों में अनधिकृत या अवैध निर्माण की स्थिति अब प्राधिकरण की रिपोर्ट से ही सामने आ गई है।”
टिकट न मिलने पर भी ट्रेन हादसे के पीडि़त को मिलेगा मुआवजा
उच्चतम न्यायालय ने 2017 में गुजरात में चलती ट्रेन से गिरकर मारे गए एक व्यक्ति के माता-पिता को दिया गया मुआवजा बहाल करते हुए कहा है कि किसी मृत रेल यात्री के पास से टिकट बरामद नहीं होने मात्र से मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने गुजरात उच्च न्यायालय का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें महेशभाई के माता-पिता को दिया गया मुआवजा खारिज कर दिया गया था। पीठ ने कहा उच्च न्यायालय ने रेल टिकट नहीं मिलने को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया और पीडि़त के पिता द्वारा शपथ लेकर दिए गए बयान एवं इस तथ्य पर विचार नहीं किया कि पीडि़त एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहा था। उपलब्ध तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पीडि़त एक वैध यात्री था और उसका टिकट बरामद नहीं होने के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में जब पीडि़त का इलाज चल रहा था तो यह संभावना बहुत कम है कि दावेदारों ने रेल टिकट संभालकर रखा होगा। न्यायालय ने कहा कि दावेदार की ओर से शपथ लेकर बयान दिए जाने के बाद तथ्यों को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे पर थी, लेकिन वह ऐसा करने में विफल रहा। जांच में देरी के लिए दावेदारों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और रेलवे अपनी ओर से जांच रिपोर्ट तैयार करने में हुई देरी का लाभ नहीं उठा सकता। पीठ ने कहा कि वह इस जांच रिपोर्ट को नजर अंदाज करने के पक्ष में है और यह रिपोर्ट दावेदारों को मुआवजा मिलने में बाधा नहीं बन सकती।
