खास तरह के पहनावे से अपराध नहीं बनता: मप्र हाईकोर्ट


आरोपों को पूरी तरह बेतुका नहीं कहा जा सकता
भोपाल : मध्य प्रदेश के दमोह के एक स्कूल में कथित तौर पर हिजाब और धार्मिक रीति-रिवाजों को थोपे जाने को लेकर हुए विवाद के तीन साल से अधिक समय बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने चार आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप और जांच में मिले सबूतों को न तो पूरी तरह बेतुका कहा जा सकता है और न ही ऐसा माना जा सकता है कि उनसे कथित अपराध बनते हैं।
मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस हिमांशु जोशी ने हिजाब के मुद्दे पर अहम बात कही। उन्होंने कहा कि सिर्फ हिजाब पहनने से मध्य प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम के तहत कोई अपराध नहीं बनता। हाई कोर्ट ने कहा “सिर्फ कोई खास तरह का पहनावा पहनने से जिसमें धर्म परिवर्तन या प्रतिबंधित तरीकों से धर्म परिवर्तन की कोशिश जैसी कानूनी शर्तें शामिल न हों, अपने-आप कोई अपराध नहीं बनता।”कोर्ट ने कहा कि प्रोसिक्यूशन का मामला सिर्फ छात्रों के हिजाब पहनने को लेकर नहीं था। इसमें यह आरोप भी शामिल था कि एक खास ड्रेस कोड अनिवार्य किया गया, छात्रों को कथित तौर पर तिलक और कलावा पहनने से रोका गया था, साथ ही उनसे कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों और प्रार्थनाओं का पालन करने को कहा गया था और उन्हें डराया-धमकाया गया था या उन पर दबाव डाला गया था। कोर्ट ने कहा “क्या ये सभी जरूरी थीं, क्या छात्र अपनी मर्जी से इनमें शामिल हुए थे और क्या प्रतिबंधित तरीकों से धर्म परिवर्तन का इरादा था, ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सबूतों की जांच-पड़ताल के बाद ही मिल सकता है।” कोर्ट ने कहा कि आरोपों को पूरी तरह बेतुका या पूरी तरह असंभव नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि प्रोसिक्यूशन को खत्म करने के लिए अपनी असाधारण निहित शक्तियों का इस्तेमाल किया जाए या नहीं, इस पर फैसला करते समय ट्रायल का आगे बढ़ चुका चरण एक अहम बात है।

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