सरकार बोली- मैरिटल रेप को अपराध बनाना संसद का काम
नयी दिल्ली: शादी के बाद पत्नी की सहमति के बिना यौन संबंध बनाने को दुष्कर्म के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं, इस बेहद अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट अब विस्तार से सुनवाई करेगा। अदालत ने साफ किया है कि शादी का मतलब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म होना नहीं है। हालांकि मामला केवल सामाजिक सोच का नहीं, बल्कि आपराधिक कानून और संविधान की कसौटी का भी है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि मैरिटल रेप को अलग अपराध बनाना संसद और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है, सुप्रीम कोर्ट का नहीं। केंद्र सरकार मैरिटल रेप को अलग से अपराध बनाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का कहना है कि ऐसा कानून बनाने से शादी और पति-पत्नी के रिश्ते पर बड़ा असर पड़ सकता है। सरकार का मानना है कि शादी के अंदर होने वाले यौन संबंधों से जुड़े मामलों को मौजूदा कानूनों के तहत ही देखा जाना चाहिए। सरकार ने यह भी कहा है कि इस मुद्दे पर सामाजिक और कानूनी दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ी अपील पर सुनवाई करेगी, जिसमें पत्नी के साथ कथित यौन हिंसा के मामले में पति के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि शादी से किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं होती। अदालत ने विवाहित महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों से जुड़े सवालों को महत्वपूर्ण माना। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि उसके सामने आपराधिक कानून का सवाल है। इसलिए पहले यह देखना होगा कि वैवाहिक दुष्कर्म का अपवाद अनुचित या साफ तौर पर मनमाना तो नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अपवाद पति को यौन हिंसा से जुड़े हर संभावित आपराधिक परिणाम से सुरक्षा नहीं देता। अगर यौन हिंसा से गंभीर चोट या मौत होती है, तो दूसरे आपराधिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। प न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालतों को आपराधिक कानून की जांच करते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसे कानून का किसी व्यक्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक जांच में व्यक्ति की मंशा, जिम्मेदारी और मौलिक अधिकारों की व्याख्या जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि कानून नागरिकों के लिए अचानक और अप्रत्याशित परिणाम पैदा न करे। अदालत ने यह भी कहा कि कोई कानून दो कारणों से असंवैधानिक हो सकता है। पहला, अगर उसे बनाने का अधिकार विधायिका के पास नहीं था। दूसरा, अगर वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। सुनवाई में यह भी कहा गया कि संसद ने 2023 में बीएनएस बनाते समय इस मुद्दे पर विचार किया था। इसलिए वैवाहिक अपवाद को बनाए रखने के पीछे सरकार का पक्ष भी अदालत के सामने रखा जाएगा।
मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की
ग्रेटर नोएडा की गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षय त्रिपाठी को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल होने पर 5 लाख रुपये का नोटिस दिया गया था। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा “हम हैरान हैं; जब हम पहले ही इसे रद्द कर चुके हैं और यह निर्देश दे चुके हैं कि पहले से दर्ज एफआईआर पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, तो मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की?” न्यायालय ने पूछा कि उसके पहले के आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले में ग्रेटर नोएडा की कार्यकारी मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगेगा। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस कैसे जारी कर सकती हैं, जबकि शीर्ष अदालत पहले ही निर्देश दे चुकी है कि छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। सीजेआई ने कहा हमारे युवाओं के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई सवाल ही नहीं है। हमने स्पष्ट आदेश पारित किया है। उन्होंने कहा हम स्पष्टीकरण मांगेंगे। वह बताएं कि ऐसा क्यों किया गया।
छठी क्लास के बच्चों को तीन भाषा नीति से मिले छूट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से कहा कि वह इस शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा-छह के छात्रों को अपनी त्रि-भाषा नीति से छूट देने पर विचार करें। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने बोर्ड से कहा कि वह इस शैक्षणिक सत्र में कक्षा-छह के छात्रों को समायोजित करने की संभावना पर विचार करें।

