नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक और हफ्ते का समय दिया। यह समय हाई कोर्ट के पूर्व जजों के लिए रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं के बारे में एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए एक पैनल गठित करने के लिए दिया गया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जब बेंच को बताया गया कि केंद्र ने अभी तक पैनल नहीं बनाया है तो बेंच ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो कोर्ट खुद कमेटी बना देगा। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने सुरक्षा कर्मियों और ड्राइवरों को रखने के लिए कुछ राज्यों की ओर से दी जा रही मौजूदा आर्थिक मदद की पर्याप्तता पर सवाल उठाया। सीजेआई ने पूछा ‘क्या 45,000-50,000 रुपये में ड्राइवर और सुरक्षा अधिकारी मिल सकते हैं?’सीजेआई ने कहा ‘राज्यों के बीच एकरूपता की कमी है। एक तरीका यह है कि भारत सरकार एक कमेटी बनाए और नियम तय करे। केंद्र सरकार अनुदान भी दे सकती है। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो मुझे एक कमेटी बनानी होगी।’ बेंच ने अपने आदेश में कहा कि ये कार्यवाही हाई कोर्ट के रिटायर हो चुके चीफ जस्टिस और जजों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले अलग-अलग फायदों और सुविधाओं से जुड़ी है। आदेश में कहा गया है कि घरेलू मदद, ड्राइवर, टेलीफोन सुविधा, मेडिकल रीइंबर्समेंट और सरकारी आवास अपने पास रखने जैसी बुनियादी सुविधाएं एक राज्य से दूसरे राज्य में काफी अलग-अलग होती हैं।
जंतर-मंतर में छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों की जांच के लिए समिति का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने नई दिल्ली के जंतर-मंतर और देश भर के अन्य स्थानों पर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया है। कमेटी को पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक और असंगत बल प्रयोग के आरोपों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा के कथित प्रयोग और चोटों की जांच करने के लिए कहा गया है। अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी करेंगे। इसके अन्य सदस्यों में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा , दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शालिंदर कौर , सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।
अवैध लिंग जांच में पुलिस नहीं दर्ज कर सकती एफआईआर
पीसीपीएनडीटी कानून के तहत दर्ज अपराधों की जांच पुलिस नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने साफ-साफ कहा कि ऐसे मामलों में कार्रवाई कानून के तहत नामित अधिकारियों को ही करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून से जुड़े मामले तकनीकी होते हैं। इनमें चिकित्सकीय जानकारी और संवेदनशीलता की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में पुलिस को इस कानून के तहत जांचकर्ता की भूमिका नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम कानून के तहत मामलों की जांच के लिए विशेष समझ की जरूरत होती है। पीठ ने कहा ‘इस कानून के उद्देश्यों के लिए पुलिस जांचकर्ता नहीं है।’ हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के प्रावधानों के अनुसार पुलिस सहायक भूमिका निभा सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस की जांच पर रोक केवल पीसीपीएनडीटी कानून के तहत आने वाले अपराधों तक सीमित है। अगर किसी मामले में सामान्य आपराधिक कानून के तहत कोई अलग अपराध सामने आता है, तो पुलिस उसकी जांच कर सकती है और अभियोजन भी चला सकती है।