आजादी के 75 साल बाद भी बेटी बचाने के पोस्टर क्यों
जब तक सोच नहीं बदलती, कड़े कानून जरूरी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बेटी के जन्म पर मां की खुशी को बयां करने वाली कविता ‘बालिका का परिचय’ का जिक्र किया. इसके साथ ही कोर्ट ने मनुस्मृति के श्लोक”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” का हवाला देते हुए बेटों को तरजीह देने वाली पुरुष-प्रधान सोच और गुपचुप तरीके से किए जाने वाले भ्रूण परीक्षण की प्रथा पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई.
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आजादी के 75 से ज्यादा साल बीत जाने के बाद भी हमारे कस्बों और शहरों में बेटियों की शिक्षा, सशक्तिकरण और वित्तीय सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले पोस्टर देखना एक आम बात है. यहां तक कि दिल्ली में भी दिल्ली परिवहन निगम की बसों पर अक्सर ऐसे संदेश लिखे हुए मिल जाते हैं. न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आता, तब तक ‘गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक’अधिनियम को कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता है. पीठ ने कहा योजनाएं इस पुरुष-प्रधान व्यवस्था में बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लगातार प्रयासों को दर्शाती हैं. इस दिशा में काफी प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.” पीठ ने संक्षेप में कहा कि हालांकि स्थिति 1990 के दशक के मध्य की तुलना में काफी बेहतर है, लेकिन आंकड़े इस मामले में लापरवाही या संतुष्ट होकर बैठ जाने की इजाजत नहीं देते. अदालत ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि अब तक हुई प्रगति अधूरी और असमान है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा “नतीजतन, पीसीपीएनडीटी अधिनियम जैसे कल्याणकारी कानूनों की ईमानदारी और सख्ती से पालना तब तक जरूरी है, जब तक कि समाज की मानसिकता में व्यापक बदलाव नहीं आ जाता. जब तक महिला की तथाकथित ‘जन्मजात कमजोरी’ की सोच वास्तविक समानता में नहीं बदल जाती, तब तक ऐसे ईमानदार प्रयास जारी रखने होंगे. जब समाज को यह अहसास हो जाएगा, तब ऐसे अभियानों की जरूरत नहीं रह जाएगी.”पीठ ने कहा कि इतिहास के पन्ने पलटने से यह बात साबित होती है. जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि राष्ट्रीय बाल लिंगानुपात साल 1991 में 945 था, जो 2001 में घटकर 927 और 2011 में और गिरकर 919 पर पहुंच गया. यह गिरावट उस गंभीर असंतुलन को दर्शाती है जिसके कारण पीसीपीएनडीटी अधिनियम को इतनी सख्ती से लागू करना पड़ा.
बेहद गंभीर मामलों में हो बर्खास्तगी का दंड
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करने जैसा सख्त दंड देने से पहले अनुशासन प्राधिकरण को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इसका असर न केवल कर्मचारी पर बल्कि उसके आश्रित परिवार पर भी बहुत गंभीर होता है। कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी का दंड केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए, जहां गलत आचरण अत्यंत गंभीर हो और जिसमें नरमी या वैकल्पिक दंड देना उचित न हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि जब कर्मचारी का व्यवहार ऐसा हो जो अनुशासन, भरोसे या संस्थागत कार्यप्रणाली के पूरी तरह खिलाफ हो, तभी बर्खास्तगी उचित मानी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार, रिश्वत, नैतिक पतन, वित्तीय गबन या बड़े आर्थिक नुकसान जैसे मामलों को अलग नजर से देखा जाता है। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में भ्रष्टाचार या बड़ा नुकसान साबित नहीं होता और कर्मचारी का सेवा रिकॉर्ड लंबा व संतोषजनक रहा हो, वहां कम सख्त सजा पर विचार किया जाना चाहिए।कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी की सजा पूरी तरह असंगत है और सक्षम अधिकारी को चाहिए कि वह कर्मचारी की लंबी सेवा, उम्र, कार्य की प्रकृति और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कोई कम सजा तय करे।
सुप्रीम कोर्ट ने लिंग चयन पर जताई गहरी चिंता