लखनऊ:इलाहाबाद हाई ने पुलिस हिरासत में लोगों को बार-बार पीटने और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने के आरोपी पुलिसकर्मियों द्वारा दायर की गई रिहाई अर्जी को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा है। हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह की हिंसा को पुलिस ड्यूटी का हिस्सा नहीं कहा जा सकता है और यह केवल अपराध है। जस्टिस मदन पाल सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने पाया कि हिरासत में लिए गए लोगों के हाथ-पैर रस्सी से बांधकर उन्हें मुंह के बल लिटाकर कथित तौर पर बार-बार पीटा गया।
पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस प्रकार की हिंसा को पुलिस कर्तव्य का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इसे केवल एक जघन्य अपराध के रूप में वर्णित किया जा सकता है और यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि पुलिस ने जांच के दौरान अपनी सीमाओं का मामूली रूप से उल्लंघन किया। अदालत ने माना कि इस तरह के आचरण में शामिल पुलिस कर्मियों को धारा 197 सीआरपीसी के तहत प्रदान की गई किसी भी प्रकार की सुरक्षा का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने गौर किया कि निचली अदालत ने सभी आठ घायल व्यक्तियों की मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच का आदेश दिया था, जिससे चोटों का पता चला। यह देखा गया कि अन्यथा, केवल पुलिस द्वारा तैयार की गई झूठी रिपोर्ट ही रिकॉर्ड में रह जाती, जिससे संभवत: घायल व्यक्तियों के खिलाफ कथित अपराध का खुलासा होने से रोका जा सकता था
