भारत की सभ्यता ने शांति और सह-अस्तित्व का संदेश दिया
श्रीनगर
लद्दाख के लोगों की देशभक्ति की सराहना करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि जब भी देश को बाहरी खतरों का सामना करना पड़ा, वहां के लोग रक्षा के लिए सबसे पहले आगे आए. उन्होंने कहा “देश की रक्षा के लिए लद्दाख के लोगों ने सबसे पहले अपने सीने पर गोलियां खाईं. कश्मीर से कन्याकुमारी और द्वारका से कामाख्या तक पूरा देश ‘भारत स्काउट्स’ के इतिहास को जानता है. भारत का हर नागरिक लद्दाख के लोगों की देशभक्ति, देश की सुरक्षा के प्रति उनके समर्पण और भारत के मुख्य हिस्से के साथ जुड़े रहने की उनकी प्रतिबद्धता की सराहना करता है.”
गृह मंत्री ने बुद्ध पूर्णिमा पर बुद्ध के अवशेषों की इस प्रदर्शनी को 75 वर्षों के बाद एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना बताया. शाह ने कहा “जब 75 साल पहले ये अवशेष यहां आए थे तब बहुत कम लोग ही इनके पवित्र दर्शन कर पाए थे. इनकी आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कर सके थे या भगवान बुद्ध का संदेश प्राप्त कर सके थे.”उन्होंने कहा कि ये अवशेष 75 साल बाद फिर से यहां आए हैं, जिससे लद्दाख के बौद्ध अनुयायियों के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोग भी इन पवित्र अवशेषों से आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करेंगे और दिव्यता का अनुभव करेंगे. दशकों पहले की सीमित पहुंच और कनेक्टिविटी का जिक्र करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में बुनियादी ढांचे में हुए तेज बदलाव ने इस क्षेत्र तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित की है. गृह मंत्री ने कहा कि यह अवसर हमें याद दिलाता है कि हजारों वर्षों से भारत की सभ्यता ने शांति और सह-अस्तित्व का संदेश दिया है. शाह ने कहा “जब दलाई लामा यहां आते हैं तो वह कहते हैं कि यह भूमि केवल एक भौगोलिक टुकड़ा नहीं है. यह भूमि बौद्ध संस्कृति और करुणा की एक जीवंत प्रयोगशाला है. इस धरती पर ज्ञान को संजोकर रखा गया है.उन्होंने कहा प्राचीन स्तूप, चट्टानों को काटकर बनाई गई बौद्ध मूर्तियां और खरोष्ठी व ब्राह्मी लिपियों में लिखे शिलालेख इस बात के प्रमाण हैं कि उस समय इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का निरंतर विस्तार हो रहा था. शाह ने कहा “कश्मीर, लेह, यारकंद, खोतान और तिब्बत को जोडऩे वाले ‘सिल्क रूट’ ने न केवल व्यापार में, बल्कि भिक्षुओं, विद्वानों और कारीगरों के बीच विचारों, पांडुलिपियों और कलात्मक परंपराओं के आदान-प्रदान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.”