घरेलू हिंसा रोग ग्रस्त सामाजिक व्यवस्था का संकेत
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा जैसी प्रथाएं अपवाद नहीं बल्कि एक रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था का संकेत हैं। देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के प्रत्यक्ष आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत ने महत्वपूर्ण आर्थिक विकास, साक्षरता में वृद्धि और शिक्षा एवं कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का अनुभव किया है, फिर भी पितृसत्ता ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न अंग बनी हुई है।
जस्टिस संजय करोल व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि संविधान समानता, लिंग के आधार पर गैर-भेदभाव और जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का वादा करता है, लेकिन ऐसे मामले दर्शाते हैं कि इतने वर्षों बाद भी, संविधान में निहित अधिकार कई लोगों के लिए अभी भी दूर हैं। अदालत ने कहा कि कानूनी सुधारों के साथ-साथ, राज्य ने कल्याणकारी और सामाजिक परिवर्तन योजनाओं और कार्यक्रमों में निवेश किया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं लैंगिक असमानता को दूर करने और लड़कियों की शिक्षा में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई हैं, जबकि सुकन्या समृद्धि योजना और उज्ज्वला योजना जैसी पहलों का लक्ष्य महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा बढ़ाना और उनके जीवन स्तर में सुधार करना है। फिर भी, सरकार की विभिन्न शाखाओं के इस निरंतर हस्तक्षेप के बावजूद, जमीनी आंकड़े बताते हैं कि स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। यह वाकई चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। पीठ ने फैसले में कहा राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार 2023 में महिलाओं के खिलाफ 44.8 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए। दहेज से संबंधित हिंसा के कारण प्रतिवर्ष 6,000 से अधिक लोगों की जान जा रही है, जो लंबे समय से प्रतिबंधित प्रथाओं की निरंतरता को उजागर करती है। पीठ ने कहा राष्ट्रीय महिला आयोग के समक्ष दर्ज शिकायतें भी लगातार घरेलू हिंसा को सबसे अधिक दर्ज शिकायतों में से एक के रूप में दर्शाती हैं। भारत ने महत्वपूर्ण आर्थिक विकास, साक्षरता में वृद्धि और शिक्षा एवं कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का अनुभव किया है। कई शहरी क्षेत्रों में लैंगिक भूमिकाएं अब सख्ती से लागू नहीं होती हैं।
घरेलू हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, साक्षरता बढ़ी, कई पहल हुए लेकिन घरेलू हिंसा नहीं रुकी