नई दिल्?ली। रिजर्व बैंक ने चेताया है कि अलग-अलग राज्यों में चुनावी वादे के तौर पर आने वाली कर्जमाफी की स्कीमों ने कृषि के क्षेत्र में क्रेडिट कल्चर को बरबाद किया है। इससे किसानों को इस बात के लिए प्रोत्साहन मिलता है कि वह कर्ज न चुकाएं और कर्जमाफी स्कीमों का इंतजार करें। वहीं, इस तरह की स्कीमों को देखते हुए बैंक भी किसानों को कर्ज देने से कतराते हैं।
दशकों का अनुभव यह बताता है कि कर्जमाफी स्कीमों से किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ है। जरूरत किसानों को डायरेक्ट इनकम सपोर्ट मुहैया कराने की है। कृषि सुधारों में डायरेक्ट इनकम सपोर्ट की बात कही गई है। 1990 के बाद से केंद्र सरकार ने केवल दो राष्ट्रीय स्तर की कर्ज माफी योजनाएं शुरू की हैं। अधिकांश योजनाएं राज्य सरकारों द्वारा घोषित की गई हैं। पिछले 35 वर्षों में केंद्र और राज्यों ने मिलकर लगभग 3 लाख करोड़ रुपये कृषि ऋणमाफी योजनाओं पर खर्च किए हैं। अक्सर कृषि ऋणमाफी योजनाएं चुनावों के आसपास घोषित की जाती हैं। आरबीआई के 2019 के इंटरनल वर्किंग ग्रुप के अनुसार, साल 1990 और 2008 की राष्ट्रीय ऋणमाफी योजनाएं तथा 2014 के बाद कई राज्यों में योजनाएं चुनावों के समय घोषित की गई थीं। आरबीआई वर्किग ग्रुप के अनुसार ऋणमाफी पर खर्च होने वाला पैसा यदि कृषि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक विकास में लगाया जाए तो अधिक लाभकारी हो सकता है़, जबकि ऋणमाफी का बहुत सीमित और अल्पकालिक प्रभाव होता है।
कर्जमाफी की स्कीमों ने कृषि के क्षेत्र में क्रेडिट कल्चर को बरबाद किया:आरबीआई