नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने पांच वर्षीय एकीकृत एलएलबी कोर्स को चार वर्ष करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान टॉप कोर्ट ने कहा कि कानूनी शिक्षा से जुड़े मामलों में अदालत अपने विचार थोप नहीं सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सीजेआई ने कहा कि कानूनी शिक्षा से संबंधित मुद्दों के लिए सभी हितधारकों के बीच व्यापक परामर्श की आवश्यकता है और इनका निर्णय केवल न्यायपालिका द्वारा नहीं किया जा सकता है। सीजेआई ने कहा “पांच वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू करने वाला संस्थान बैंगलोर का नेशनल लॉ स्कूल नहीं बल्कि महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक था। पहला बैच लगभग 1982 या 1983 में शुरू हुआ था।” पीठ ने कहा कि न्यायपालिका कानूनी शिक्षा नीति को आकार देने में शामिल कई हितधारकों में से केवल एक है। चीफ जस्टिस ने कहा न्यायपालिका केवल एक हितधारक है। हम अपने विचार थोप नहीं सकते। विषय पर विचार-विमर्श होना चाहिए।” न्यायालय ने सवाल किया कि यदि विश्वविद्यालय स्वयं वर्तमान संरचना के विरोध में हैं तो न्यायिक हस्तक्षेप क्यों आवश्यक है। सीजेआई ने पूछा कि तो फिर पांच साल को कम क्यों नहीं कर सकते? इसके लिए अदालत की क्या जरूरत है।
कानूनी शिक्षा से जुड़े मामलों में हम अपने विचार थोप नहीं सकते :सुप्रीम कोर्ट