विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल तक जेल में रखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने इसे ‘लापरवाही से की गई जांच’ बताया। साथ ही, राज्य सरकार को एक व्यक्ति को छह लाख रुपये देने का निर्देश दिया। वह व्यक्ति विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल तक जेल में रहा था। अदालत ने कहा कि महज अटकलों और अनुमानों के आधार पर मनगढ़ंत कहानी बनाई गई। इसके कारण उस व्यक्ति के जीवन के छह साल बर्बाद हो गए।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। खासकर तब, जब किसी आपराधिक मामले में आरोपी बनाए गए व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। पीठ ने कहा कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम किसी भी तरह दोषसिद्धि हासिल करना भर नहीं है। पीठ ने कहा उन्हें खुद को न्याय देने की व्यवस्था का अहम हिस्सा मानना चाहिए। उन्हें केवल पीडि़त, वास्तव में शिकायत करने वाले व्यक्ति और घायल को ही नहीं, बल्कि आरोपी को भी न्याय दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए। कोर्ट ने कहा, हम कई मामलों में न्याय की ऐसी विफलता देखते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यह इतनी स्पष्ट और चौंकाने वाली होती है, जैसा कि इस मामले में है। ऐसे मामले में आरोपी को मुआवजा दिया जाना जरूरी है। पीठ ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ सबूत नहीं होने के बावजूद उसे विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल तक जेल में रखा गया। पीठ ने कहा, लापरवाही से की गई जांच के आधार पर अव्यवस्थित तरीके से मुकदमा चलाया गया। हम जांच करने और अभियोजन चलाने के तरीके की निंदा किए बिना नहीं रह सकते।

