जज पॉक्सो की पूर्वधारणा वाली धाराओं को सजा सुनाने का शॉर्टकट न बनने दें
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ढाई साल की एक बच्ची के अपहरण और यौन उत्पीडऩ के दोषी व्यक्ति को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि “अदालत को दोषी होने के पूर्वधारणा वाले प्रावधान से प्रभावित या बंधा हुआ नहीं होना चाहिए.” शीर्ष अदालत ने जजों को आगाह किया कि वे पॉक्सो की पूर्वधारणा वाली धाराओं को सजा सुनाने का शॉर्टकट न बनने दें.
फैसले में,जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा कि साक्ष्यों का विश्लेषण और व्याख्या करते समय अदालत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह किसी पूर्वधारणा वाले प्रावधान के अस्तित्व से खुद को प्रभावित होने दे और अभियोजन पक्ष की ओर झुकाव दिखाए. पीठ ने कहा अदालत को आरोपी के दोषी होने और अपराध करने के प्रावधान वाली पूर्वधारणा से प्रभावित या बंधा हुआ नहीं होना चाहिए, बल्कि साक्ष्यों को सामान्य सिद्धांतों के आधार पर ही तौलना चाहिए. आरोपी को पूर्वधारणा को खारिज करने और अभियोजन पक्ष के मामले को ध्वस्त करने के लिए विपरीत साबित करने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए.”पीठ ने कहा “किसी भी आपराधिक अपराध के मुकदमे का सामना कर रहे आरोपी को सजा मिलने या बरी होने के मामले में, अनिवार्य रूप से उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा शामिल होता है. जब कानून के तहत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा कोई मुद्दा सामने आता है, तो अदालत को अतिरिक्त रूप से सतर्क और सावधान रहना होगा.” पीठ ने कहा कि वैधानिक पूर्वधारणाओं का यह अर्थ बिल्कुल नहीं निकाला जा सकता कि अभियोजन पक्ष की बात को हर मामले में अंतिम और अकाट्य सत्य मान लिया जाए. पीठ ने कहा कि यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पूर्वधारणा वाले प्रावधानों के बावजूद, अदालतें किसी विशेष मामले में सामने आने वाली विशेषताओं के आलोक में रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का विश्लेषण करने के अपने आवश्यक कर्तव्य से मुक्त नहीं हो जाती हैं. शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपी के दोष को उचित संदेह से परे साबित किया जाना चाहिए था, न कि केवल संभावनाओं की प्रधानता के आधार पर.
अवैध शराब की मांग और आपूर्ति पर एक साथ रोक लगाना जरूरी
जहरीली और नकली शराब से होने वाली मौतों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए कई सुझाव दिए हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि अवैध शराब की मांग और आपूर्ति, दोनों पर एक साथ रोक लगाना जरूरी है। राज्यों को अपनी सीमाओं पर निगरानी बढ़ाने की सलाह दी गई है, क्योंकि शराब राज्य के भीतर भी बनती है और बाहर से भी लाई जाती है। परिवहन विभाग की सीमा पर सतर्कता अवैध शराब की आवाजाही रोकने में मदद कर सकती है। पुलिस को निषेध और आबकारी विभाग के साथ मिलकर स्थानीय शराब बनाने वाली जगहों की पहचान कर कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि शराब की खरीद, निर्माण, परिवहन, बिक्री और सेवन से जुड़े मौजूदा कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है। अदालत के मुताबिक नकली शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक सॉल्वेंट आम तौर पर औद्योगिक इकाइयों से अवैध तरीके से हासिल किए जाते हैं। इसलिए उद्योग विभाग को ऐसी इकाइयों पर निगरानी रखनी चाहिए जो रासायनिक सॉल्वेंट बनाती और बेचती हैं। मेथनॉल से जुड़े लाइसेंस और परमिट देने के नियमों की व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए।अदालत ने कहा कि मेथनॉल जहरीला और खतरनाक पदार्थ है, इसलिए इसकी बिक्री और कब्जे पर प्रभावी नियमन जरूरी है। अदालत ने कहा कि जहरीली शराब की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कई विभागों के बीच समन्वय के साथ काम करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि अवैध शराब रोकने के लिए केवल शराबबंदी पर निर्भर रहना समाधान नहीं है।

