धर्म को केवल रिलीजन मानना उचित नहीं
उज्जैन : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवा धर्म संसद में कहा “धर्म को समझने के लिए मन को खाली रखना जरूरी है. धर्म को केवल रिलीजन मानना उचित नहीं है.” भागवत ने कहा आज भी कई लोग मानते हैं कि धर्म बुजुर्गों के लिए है, जबकि ऐसा नहीं है. पश्चिमी देशों के लोग जब भारत आए तो उन्होंने यहां लोगों को धर्म का आचरण करते देखा. उसे अपनी दृष्टि से समझते हुए रिलीजन की संज्ञा दे दी. बाद में भारत में भी धर्म को रिलीजन कहा जाने लगा. रिलीजन बांधने का काम करता है और धर्म मुक्त करता है. कचरा नहीं करना, ट्रैफिक के नियम का पालन करना, किसी की भी उपासना का सम्मान करना ही हमारा धर्म है. उपासना हमें गुरु परंपरा से मिली है लेकिन हम कभी कन्वर्ट नहीं हुए.”
डॉ. मोहन भागवत ने मनुष्य का कर्तव्य केवल अपनी जरूरत की पूर्ति करना नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव जगत के प्रति संवेदनशील रहना धर्म है. मानव ने शुरुआत से ही प्रकृति और जीवन की बर्बादी शुरू की. आज हम देखते हैं कि वन्य जीव विलुप्त हो रहे हैं. इसका कारण भी अधर्म है. अधर्म के कारण आज मनुष्य पर्यावरण और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है. सवाल उठ रहा है कि पर्यावरण बचेगा या नहीं और मनुष्य का अस्तित्व बचेगा या नहीं. आज के युवा यशस्वी नहीं, सार्थक बनें, ऐसा विचार मन में होना चाहिए.”पाकिस्तान का नाम लिए बिना आरएसएस चीफ ने कहा “वह हमसे द्वेष करता है. बिना कारण विवाद करता है. बार-बार तकलीफ देता है. उसे कई बार सबक भी सिखाया. बहुत उपद्रव करता है. अलग रहना है रहो, हमने तो संकट के समय में भी मदद की, क्योंकि हमारे डीएनए में धर्म है. हमारा कर्तव्य यही बनता है कि शक्तिशाली विद्वान बने, धर्म बुद्धि के साथ आगे बढ़े.”

