बच्चे की भलाई सबसे अहम होनी चाहिए
रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने चार वर्षीय बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा उसकी मां को सौंप दी है। अदालत का मानना ??है कि बच्ची के कल्याण और उसे मां के स्नेह और प्यार की जरूरत को देखते हुए मुख्य अभिरक्षा कार्यवाही लंबित रहने तक बच्ची की कस्टडी मां के पास ही होनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि बच्ची का जन्म आईवीएफ के माध्यम से हुआ है और मां ने इससे जुड़े दर्द और त्याग को सहन किया है।
पीठ ने कहा कि उसकी उम्र महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उसकी तत्काल जरूरतों और अपनी पसंद को समझदारी से व्यक्त करने की उसकी क्षमता का आकलन किया जा सकता है। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चे की भलाई सबसे अहम होनी चाहिए। माता-पिता दोनों के अपने-अपने दावों से ज्यादा महत्व बच्चे के हित का है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अभिरक्षा संबंधी मामलों का निर्णय केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि बच्ची को आराम, संतुष्टि, स्वास्थ्य, शिक्षा, बौद्धिक विकास, परिवेश और नैतिक एवं सामाजिक कल्याण उन कारकों में शामिल हैं, जिन पर विचार किया जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि बच्चे का कल्याण केवल आर्थिक समृद्धि या भावनात्मक चिंता से निर्धारित नहीं होता, बल्कि बच्चे की संपूर्ण भलाई सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रासंगिक कारकों को संतुलित करके निर्धारित किया जाता है। मां को बच्चे की अंतरिम कस्टडी देते हुए हाई कोर्ट ने पिता को बच्चे से मिलने से नहीं रोका। कोर्ट ने कहा कि पिता हर सप्ताहांत सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मुलाकात कर सकते हैं। मुलाकात दोनों पक्षों की सहमति से तय जगह पर या फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित स्थान पर हो सकती है। न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि मुलाक़ात की व्यवस्था से बच्ची की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए कि बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा एक सप्ताह के भीतर मां को सौंप दी जाए।

