सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, बूथ-वार गिनती के लिए छूट का सिद्धांत ईवीएम पर भी लागू न हो ऐसा कोई कारण नहीं


टोटलाइजर पहचान छिपाने को पक्का करने के लिए अच्छा है.
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में रिकॉर्ड किए गए वोटों की गिनती के लिए टोटलाइजर लगाने की मांग वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा. टोटलाइजर एक ऐसा डिवाइस है जिससे लगभग 14 पोलिंग बूथ पर डाले गए वोटों की गिनती एक साथ की जा सकती है. यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना की बेंच के सामने आया.
जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसा कोई कारण नहीं है कि बूथ-वार गिनती के लिए छूट का सिद्धांत ईवीएम पर भी लागू न हो. बेंच ने साफ किया कि वह जरूरी नहीं कि मौजूदा बूथ-वार गिनती प्रणाली के बदलाव या प्रतिस्थापन के तौर पर टोटलाइजेशन पर विचार कर रही हो. दलीलें सुनने के बाद, बेंच ने सेंटर से टोटलाइजर शुरू करने में आने वाली रुकावटों के बारे में बताने को कहा.बेंच ने कहा “केंद्र, ईवीएम में रिकॉर्ड किए गए वोटों की गिनती के लिए टोटलाइजर लाने के लिए कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स में जरूरी बदलाव करने के मुद्दे पर विचार कर सकता है. हम जानना चाहेंगे कि क्या रुकावटें हैं, अगर कोई हैं, और क्या इस तरह के सिस्टम को लाने से कोई बुरा असर पड़ेगा.” बेंच ने केंद्र से चुनाव नियम और भारत का विधि आयोग की सिफारिशों की जांच करने को कहा, जिसमें टोटलाइजेशन का प्रस्तावित प्रवाधान भी शामिल है. बेंच ने कहा कि सिद्धांत रूप में टोटलाइजर पहचान छिपाने को पक्का करने के लिए अच्छा है. बेंच ने कहा कि वह इस पर केंद्र की राय जानना चाहेगी, और कहा कि आम नियम टोटलाइजेशन के पक्ष में है.
डॉक्टर पर हमला करने वाले लोग जमानत के लायक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्पतालों के अंदर मेडिकल प्रोफेशनल्स पर होने वाले हमलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने े टिप्पणी की कि डॉक्टरों पर हमला करने वाले लोग जमानत के हकदार नहीं हैं। पीठ ने सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा इनमें मेडिकल जगत के लिए कोई सम्मान नहीं है। जब कोई भीड़ हमला करती है तो कितना सदमा लगता है। क्या आप अस्पताल के अंदर जाकर किसी भी अनजान व्यक्ति को पीटेंगे?”
नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी एफआईआर रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने उन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दीं, जिन्होंने कथित पेपर लीक के खिलाफ हाल ही में देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। कोर्ट ने प्रदर्शनकारी छात्रों को राहत देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा पारित इस आदेश में दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले में छात्रों के खिलाफ दर्ज स्नढ्ढक्र शामिल हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि 20 से 25 जुलाई के बीच दिल्ली में जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में हजारों छात्रों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। कोर्ट ने साफ किया कि यह राहत उन लोगों को नहीं मिलेगी जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। दिल्ली पुलिस उन 2,873 लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई जारी रखेगी जिनके ख़िलाफ़ पहले से आपराधिक मामले दर्ज हैं या जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।

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