संसद के फैसले का इंतजार नहीं
लंदन :सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि भारतीय न्यायपालिका डिजिटल अरेस्ट जैसे तेजी से उभरते धोखाधड़ी के तरीकों से निपटने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रही है और ऐसे मामलों में संसद की ओर से कानून बनाए जाने का इंतजार नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि बदलती तकनीक के साथ आर्थिक अपराधों के स्वरूप में भी तेजी से बदलाव हो रहा है और न्यायपालिका को इन चुनौतियों के अनुरूप अपनी भूमिका निभानी होगी। लंदन में आयोजित 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम ऑन इकोनॉमिक क्राइम के समापन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने बताया कि ऐसे मामलों में साइबर ठग पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों या सरकारी नौकरशाहों का रूप धारण कर वीडियो कॉल के जरिए लोगों को डराते हैं और उनसे पैसे ऐंठते हैं।
चीफ जस्टिस ने कहा डिजिटल अरेस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को इस समस्या का आकलन विस्तार से करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा यह भारतीय न्यायपालिका के उस व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें न्यायपालिका उभरते हुए धोखाधड़ी के तरीकों पर समय रहते प्रतिक्रिया देती है। सीजेआई ने कहा कि भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने की व्यवस्था किसी एक कानून तक सीमित नहीं है। बीते कई दशकों में व्यापक ढांचा विकसित हुआ है। इसमें कानून, जांच एजेंसियां, संस्थागत व्यवस्थाएं और न्यायिक सिद्धांतों की अपनी-अपनी भूमिका रही है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि केवल मौखिक रूप से गिरफ्तारी के कारण पढक़र सुना देना पर्याप्त नहीं है। चीफ जस्टिस ने कहा अगर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े वैश्विक अनुमान मोटे तौर पर भी सही हैं तो दुनिया में एक साल में जितने पैसों का अवैध लेन-देन किया जाता है, उससे धरती पर मौजूद करीब आठ अरब लोगों में से हर एक के लिए एक सामान्य लैपटॉप खरीदा जा सकता है। इसके बाद भी पैसा बच सकता है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में अवैध धन के प्रवाह के बावजूद, केवल एक प्रतिशत से कम अवैध संपत्ति ही बरामद हो पाती है।
