नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संजय करोल को उनके ऑफिस के आखिरी दिन विदाई दी गई. अपने विदाई भाषण में जस्टिस करोल ने न्याय करने की सीमाओं पर खुलकर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि “हम जज, भगवान नहीं हैं” और हर फैसला सही नहीं दे सकते. उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण यह है कि याचिका के पीछे के इंसान को देखने की काबिलियत. एक याचिका केवल तथ्य बता सकती है, यह नहीं बता सकती कि किसी ने क्या खोया है, या क्या वापस पाना चाहता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि इसलिए, फैसले लेने में विनम्रता की आवश्यकता होती है.
जस्टिस करोल ने कहा “हम न्यायाधीश होने के नाते भगवान नहीं हैं. हम हर फैसला सही नहीं सुना सकते. हमारे हाथों में हमेशा से एक ही बात सरल रही है सिर्फ याचिकाकर्ता को नहीं, बल्कि उस इंसान को देखना. एक याचिका केवल एक मामले के तथ्य बता सकती है, लेकिन यह नहीं बता सकती कि उस व्यक्ति ने पहले ही क्या खो दिया है या वह अदालतों से क्या पाने की उम्मीद कर रहा है. शायद यही कारण है कि मैंने हमेशा कहा है कि न्याय करने में एक विशेष स्तर की विनम्रता की आवश्यकता होती है.”उन्होंने कहा कि अदालत उनके लिए सिर्फ एक काम करने की जगह नहीं थी, बल्कि खुद से “बढक़र और अधिक महत्वपूर्ण” किसी चीज का एक जरिया थी. उन्होंने कहा”मैं यह दिखावा नहीं करूंगा कि यह यात्रा अकेली मेरी रही है. इस अदालत ने मुझे छोड़ा नहीं है इसने मेरा साथ दिया है.”उन्होंने कोर्टरूम में बोले गए तर्कों से परे सुनने के महत्व पर जोर दिया और कहा कि वहां मूक मौन भी होते हैं, जिन्हें न्यायाधीशों को समझना सीखना चाहिए. जस्टिस करोल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का वास्तविक महत्व एक आम नागरिक के इस विश्वास में निहित है, जो यह विश्वास करते हुए इसके दरवाजे पर कदम रखता है कि कोई न कोई उसकी बात सुनेगा. उन्होंने कहा “न्याय की रक्षा करना और यह देखना कि अदालत के सामने खड़ा व्यक्ति, चाहे वह कितना भी छोटा हो, कितना भी दयनीय हो, उसे देखा और सुना जाए, यही एक जज का कर्तव्य है.”
