व्यभिचार में रह रही पत्नी गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं : सुप्रीम कोर्ट


अधिकारों के हनन पर प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था हो
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति यह दावा करता है कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है और वह शुरुआती स्तर पर उसके समर्थन में प्रथमदृष्टया साक्ष्य पेश कर देता है, तो अदालत को अंतरिम गुजारा-भत्ता देने से पहले उस आपत्ति पर विचार कर फैसला करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि निजी जासूसों के जरिए सबूत जुटाने के बढ़ते चलन को नियंत्रित करने के लिए कानूनी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि चूंकि यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि पत्नी के व्यभिचार में रहने का आरोप सिद्ध हो जाता है, तो वह न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुजारा-भत्ते की हकदार होगी।ठ्ठ यह फैसला राजस्थान के एक व्यक्ति की अपील पर आया, जिसने राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें व्यभिचार के आधार पर पत्नी को गुजारा-भत्ता देने का विरोध करने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी।
अदालत ने कहा कि अंतरिम गुजारा-भत्ता तय करते समय ट्रायल कोर्ट को यह जांचना होगा कि प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया व्यभिचार साबित करते हैं या नहीं। साथ ही पत्नी को भी इन साक्ष्यों की सत्यता और वैधता पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है, और अदालत को उन आपत्तियों पर भी विचार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पति ने पत्नी की तस्वीरें और वीडियो जुटाने के लिए एक निजी जासूस की सेवाएं ली थीं। अदालत ने कहा कि सबूत जुटाने के बदलते तरीकों को देखते हुए ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था और नियामक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि कानून, कानून लागू करने वाली एजेंसियां और गोपनीयता विशेषज्ञ मिलकर ऐसे नियम तैयार करें, जिनसे यह तय हो सके कि निजी जांचकर्ता अपनी पेशेवर सीमाओं का उल्लंघन न करें। यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों का हनन होता है, तो उसके लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था भी होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस विषय पर आवश्यक कानूनी ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी विधायिका की है। इसके लिए सरकार अन्य देशों के कानूनों और व्यवस्थाओं का भी अध्ययन कर सकती है।
शादीशुदा बेटी भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति पर विचार करने से सिर्फ इसलिए मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि राज्य सरकार की पॉलिसी में ऐसी नियुक्तियां सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों के लिए ही हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा वर्गीकरण असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद का उल्लंघन है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने सायरा खातून और उनकी बेटी की अपील को मंजूरी दे दी। जस्टिस सुंदरेश की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में बेटों और बेटियों के बीच कोई भी भेदभाव संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कोर्ट ने बार-बार यह माना है कि बेटी और बेटे के बीच फर्क करने वाला कोई भी वर्गीकरण अपने आप में असंवैधानिक है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटी तक पात्रता को सीमित करने वाला वर्गीकरण कानून की नजर में टिक नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी कोई धारणा नहीं हो सकती कि शादी के बाद बेटी अपने मायके से रिश्ते तोड़ लेती है और ससुराल में अपने पति के साथ रहती है। बेंच ने कहा कि किसी भी स्थिति में बहुत ज्यादा तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना उसके अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे पर विचार करने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *