बेंगलुरु :राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने तर्क दिया कि आरएसएस को रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं है और इसकी तुलना हिंदू धर्म से की. आरएसएस के एक संगठन के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराने की मांगों पर प्रतिक्रिया देते हुए भागवत ने कहा कि ऐसी मांगें किसी वास्तविक कानूनी चिंता के बजाय राजनीति से प्रेरित हैं.
भागवत ने कहा “हिंदू धर्म रजिस्टर्ड नहीं है. कई चीजें रजिस्टर्ड नहीं होतीं. जिन्हें सरकारी फंड चाहिए, उन्हें रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती है. लेकिन सरकार जानती है कि संघ मौजूद है.भागवत ने कहा कि संगठन की गतिविधियां सबके सामने होती हैं और लोग उन्हें देख सकते हैं.उन्होंने कहा “हम कोई गुप्त काम नहीं करते. हम सबके सामने काम करते हैं. हम लोगों को बुलाते हैं और उन्हें अपनी गतिविधियों के बारे में बताते हैं. हमारे स्वयंसेवक लोगों के बीच रहते हैं और हमारे कार्यक्रम सभी को दिखाई देते हैं.” आरएसएस प्रमुख ने बताया कि अलग-अलग सरकारों को संगठन के अस्तित्व के बारे में पूरी जानकारी थी आजाद भारत में संगठन पर दो बार प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे बाद में हटा लिया गया. उन्होंने कहा कि आरएसएस ने 1950 के दशक में ही सरकार को अपना लिखित संविधान सौंप दिया था और किसी भी अधिकारी ने संगठन के कामकाज के लिए रजिस्ट्रेशन को जरूरी शर्त नहीं बताया था.उन्होंने कहा “हमारा लिखित संविधान सरकार के पास है. अगर रजिस्ट्रेशन जरूरी होता, तो सरकार ने उस समय ऐसा कहा होता. किसी ने ऐसा नहीं कहा.”उन्होंने कहा, “यह सब राजनीति है, कोई गंभीर बात नहीं है. वे संघ के काम में रुकावट डालना चाहते हैं और लोगों के मन में शक पैदा करना चाहते हैं. लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं है क्योंकि लोग हमें जानते हैं.”
पाकिस्तान में एक वर्ग विभाजन को गलत मानता है
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि पाकिस्तान में आज भी ऐसे कई लोग मौजूद हैं, जो दिल से मानते हैं कि भारत का बटवारा एक बहुत बड़ी गलती थी। वहां के कई पत्रकार और आम नागरिक संघ के काम की तारीफ भी करते हैं। पाकिस्तान के अंदर अब एक ऐसा बड़ा वर्ग तैयार हो रहा है, जो ‘टू-नेशन थ्योरी’ के खिलाफ है और जिसका मानना है कि दोनों देशों का एक साथ मिलकर रहना कहीं ज्यादा बेहतर था। भागवत ने कहा “हम हिटलर की तरह क्रूर नहीं हैं, यह हमारा स्वभाव और हमारी संस्कृति नहीं है। अगर भविष्य में हम अन्याय और अत्याचार को पूरी तरह हरा भी देते हैं, तब भी हमें वहां के अच्छे लोगों को संभालना होगा। या तो उन्हें मुख्यधारा में शामिल करना होगा या फिर उन्हें शांति से जीने का मौका देना होगा। इसके लिए बातचीत का रास्ता खुला रखना बेहद जरूरी है।”
