मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ का भोजशाला मामले में ऐतिहासिक फैसला, भोजशाला परिसर मूल रूप से एक मंदिर है


हिंदू समाज को यहां रोज पूजा-अर्चना करने का अधिकार
भोजशाला के अंदर अब कोई नमाज अदा नहीं होगी
मुस्लिम पक्ष को इबादत के लिए अलग से जमीन उपलब्ध कराई जाएगी
इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले के विवादित भोजशाला परिसर पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे माँ वाग्देवी का मंदिर घोषित कर दिया है। जस्टिस आलोक कुमार अवस्थी ने फैसला पढ़ते हुए स्पष्ट किया कि यह परिसर मूल रूप से एक मंदिर है। कोर्ट ने आदेश दिया कि मुस्लिम पक्ष को इबादत के लिए अलग से जमीन उपलब्ध कराई जाएगी, जिसके लिए वे सरकार के समक्ष याचिका दायर कर सकते हैं।
उच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा है कि भोजशाला भवन का धार्मिक स्वरूप मां वाग्देवी सरस्वती के मंदिर का है. साथ ही यह एक पुरातात्विक व संरक्षित भवन है, जिसे आर्कियोलॉजिकल साइट्स एंड रिमेन्स एक्ट, 1958 के तहत संरक्षित स्मारक माना गया है. न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी है कि यदि कोई अन्य धार्मिक पक्ष अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप भूमि आवंटन कराना चाहता है, तो वह राज्य शासन को अभ्यावेदन दे सकता है, जिसका विधिसम्मत निराकरण किया जाएगा. हाईकोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मानते हुए हिंदू धर्म के लोगों को पूजा का अधिकार दे दिया है. कोर्ट ने यह फैसला एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार करने के बाद सुनाया है, कोर्ट ने एएसआई को भोजशाला में संरक्षण का अधिकार भी दिया है. कोर्ट का कहना है कि भोजशाला के अंदर अब कोई नमाज अदा नहीं होगी. वहां रोजाना पूजा की जाएगी. कोर्ट ने मामले में मुस्लिम पक्ष को कलेक्टर को आवेदन कर दूसरी जगह जमीन देने की बात कही है. इधर मुस्लिम समाज ने फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है. कोर्ट ने भारत सरकार को निर्देशित किया है कि ब्रिटेन के म्यूजियम में रखी वाग्देवी प्रतिमा को वापस भारत लाने संबंधी प्रतिनिधित्व पर भी विचार किया जाए. यह मुद्दा लंबे समय से हिंदू संगठनों द्वारा उठाया जाता रहा है. हाईकोर्ट ने कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और कोर्ट वैज्ञानिक निष्कर्षों पर भरोसा कर सकती है. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं का संरक्षण करे.हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि भोजशाला एक संरक्षित स्मारक है और इसे वाग्देवी का मंदिर माना जाएगा.
कब उठा भोजशाला का विवाद
धार भोजशाला का विवाद 2022 में उठा. हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से 2 मई 2022 को इंदौर हाई कोर्ट में याचिका लगाई गई. इसमें कहा गया कि भोजशाला में मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलेह की मस्जिद में नमाज बंद हो. हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिले और लंदन में रखी वाग्रदेवी की प्रतिमा लाई जाए. 5 फरवरी 2024 को हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से अंतरिम आवेदन दिया गया, जिसमें नवीनतम टेक्नोलॉजी के साथ ्रस्ढ्ढ सर्वे किया जाने की बात की गई. 19 फरवरी 2024 को ये आदेश सुरक्षित रख लिया गया. 11 मार्च 2024 को इंदौर हाईकोर्ट ने एएसआई को सर्वे के आदेश दिए.
भोजशाला पर हिंदू-मुस्लिम पक्ष की दलील
हिंदू पक्ष का कहना था कि, धार भोजशाला वाग्देवी देवी का मंदिर है. हिंदू पक्ष का आरोप है कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को तोड़ दिया था. 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला के एक हिस्से में मस्जिद बनवा दी. इसके बाद महमूद शाह खिलजी ने 1514 में दूसरे हिस्से में भी मस्जिद बनवा दी. 1875 में यहां पर खुदाई की गई. खुदाई में सरस्वती देवी की प्रतिमा निकली. मां सरस्वती की इस प्रतिमा को मेजर किनकेड नाम का अंग्रेज लंदन ले गया. फिलहाल ये प्रतिमा लंदन के संग्रहालय में है.वहीं मुस्लिम समाज का कहना था कि, भोजशाला स्थल पर कभी भी किसी तरह का कोई मंदिर या सरस्वती मंदिर के अस्तित्व नहीं मिला है. उसके तोडऩे या उसकी जगह मस्जिद निर्माण जैसी बातों का कोई प्रमाण नहीं है.
98 दिन ्रस्ढ्ढ ने दिन रात किया सर्वे
मंदिर के पक्ष में फैसला देने में एएसआई की रिपोर्ट की अहम भूमिका रही है. कोर्ट से सर्वे का आदेश मिलते ही देश भर से 75 आर्कियोलॉजिस्ट धार भोजशाला पहुंच गए और सर्वे शुरु कर दिया. ताकि यह समझा जा सके कि वहां की असली ऐतिहासिक स्थिति क्या है. टीम ने लगातार 98 दिनों तक दिन रात सर्वे का कार्य किया. इस दौरान पूरे परिसर को सुरक्षा के घेरे में विशेषज्ञों की टीम ने लिया था. मशीनों से खुदाई के दौरान कई मूर्तियां जमीन से निकली थी. 98 दिन के सर्वे करने के बाद टीम ने 242 पेज की रिपोर्ट इंदौर हाईकोर्ट में पेश की थी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *