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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जवाब, कहा-एसआईआर पर फैसले सर्वसम्मति से


फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं’
नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 15 बिंदुओं वाला जवाबी हलफनामा दाखिल कर अपनी प्रक्रिया और फैसलों का बचाव किया। आयोग ने मतदाता सूची में अनियमितताओं के आरोपों को खारिज करते हुए याचिका के आधार पर भी सवाल उठाए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने इस हलफनामे को सर्वसम्मति से मंजूरी दी।
चुनाव आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में एसआईआर की प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर 15 प्रमुख बातें रखीं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने जवाबी हलफनामे को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। आयोग ने कहा कि जून 2025, अक्तूबर 2025 और मई 2026 में एसआईआर को लेकर जारी तीनों आदेश आयोग के सर्वसम्मत फैसले थे। आयोग के अनुसार, किसी फाइल पर मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त की ओर से लिखे गए सवाल, सुझाव या टिप्पणियों को आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। सामान्य तौर पर फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और उसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती है। तत्काल मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है और बाद में उसे फाइल में दर्ज किया जाता है। आयोग ने कहा कि अगर कोई अधिकारी उसे सौंपे गए अधिकारों से बाहर जाकर आदेश जारी करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। आयोग ने बताया कि 28 जुलाई का कार्य आवंटन आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए एक अतिरिक्त सचिव ने जारी किया था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने अगले दिन कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। आयोग के संयुक्त निर्देश के बाद 30 जुलाई को यह आदेश लागू नहीं किया गया। आयोग ने कहा कि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, इसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। आयोग ने स्पष्ट किया कि एसआईआर के लिए इस्तेमाल होने वाला घोषणा पत्र फॉर्म-6 से अलग है। हालांकि, ऑनलाइन आवेदन में इसे दिखाने के तरीके से फॉर्म में बदलाव होने का भ्रम पैदा हो सकता था।
ईसीआईनेट पर नाम जोडऩे या हटाने का अधिकार
आयोग ने कहा कि ईसीआईनेट पर किसी मतदाता का नाम केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के आदेश से जोड़ा या हटाया जा सकता है। इस व्यवस्था की जांच के लिए आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों वाली समिति बनाई गई है। आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ रोक लगाने की मांग वाली याचिका को कानूनी रूप से विचार योग्य नहीं बताया। आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी है।

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