किसी कर्मचारी पर रिश्वत मांगने के आरोप की जांच शुरू करने से पहले सरकारी मंजूरी लेना जरूरी नहीं
नई दिल्ली:उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी पर रिश्वत मांगने का आरोप है और उसका संबंध उसके आधिकारिक काम से नहीं है तो जांच शुरू करने से पहले सरकारी मंजूरी लेना जरूरी नहीं है। न्यायालय ने साफ किया कि सरकारी काम करते हुए लिए गए फैसले और रिश्वत मांगने जैसे आपराधिक कृत्य को एक जैसा नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति एसवी भट्टी और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायालय ने कहा “रिश्वत मांगना अपने आप में एक आपराधिक कृत्य है। इसका सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कामकाज से कोई संबंध नहीं है। न ही इसका उसके पद पर रहते हुए लिए गए किसी फैसले या की गई किसी सिफारिश से कोई जुड़ाव है।” उच्चतम न्यायालय ने कहा कि धारा 17 (क) की सुरक्षा हर उस मामले में नहीं मिल सकती, जिसमें किसी सरकारी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा हो। इस सुरक्षा के लिए जरूरी है कि आरोप का संबंध कर्मचारी के आधिकारिक काम के दौरान लिए गए किसी फैसले या की गई सिफारिश से हो। न्यायालय ने कहा “इस धारा के तहत सुरक्षा तभी मिल सकती है, जब इसमें बताई गई शर्तें पूरी हों। इसे ऐसा प्रावधान नहीं माना जा सकता, जो हर मामले में लागू हो।
कर्ज वसूली के विवाद को जातिगत भेदभाव का रंग न दें
सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्ज वसूली जैसे व्यावसायिक विवाद को जातिगत अत्याचार का रंग नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने कहा कि जाति के आधार पर अपमान का ठोस आरोप होना आवश्यक है। इसी आधार पर जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर रद्द कर दी। पीठ ने केस रद्द करते हुए कहा, अधिकारियों पर निदेशकों का जाति के आधार पर अपमान करने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं है।

