शीर्ष अदालत के किसी मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर सार्वजनिक बयान नहीं देना चाहिए: पूर्व सीजेआई
नई दिल्ली :सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने एसआईआर को लेकर टिप्पणी की थी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि न्यायिक मर्यादा उन्हें ऐसे मामले पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देगी जो सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। उनका कहना था कि शीर्ष अदालत के किसी मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर सार्वजनिक बयान नहीं देना चाहिए, जिस पर उसी अदालत में सुनवाई हो रही हो। गवई की इस राय से दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा और आरएस सोढ़ी ने भी सहमति जताई और जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए।
दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा ने कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी शीर्ष अदालत के मौजूदा न्यायाधीश की सीमाओं से काफी आगे थी। उन्होंने कहा कि जब मामला उसी अदालत में लंबित हो तो सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस भुइयां को ऐसा बयान देने से पहले पूरे मामले के तथ्यों पर विचार करना चाहिए था। सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा ने चुनाव आयुक्तों के बीच एसआईआर को लेकर कथित मतभेदों पर कहा कि अगर कोई असहमति है तो चुनाव आयुक्त खुद अपनी बात रखने में सक्षम हैं। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी ने कहा कि मतदान का अधिकार कानूनी व्यवस्था के तहत तय होता है। अगर कोई व्यक्ति कानून में तय शर्तों के दायरे में आता है तो उसे वोट देने का अधिकार है और अगर वह शर्तों के दायरे में नहीं आता तो उसे वोट का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी ऐसे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है जो कानूनी शर्तें पूरी नहीं करता तो उसे हटाने की प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए। वहीं, पात्र व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हट गया है तो वह फिर से नाम शामिल कराने की कानूनी प्रक्रिया अपना सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाया :जस्टिस नरीमन
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने इस बात पर अफसोस जताया कि पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं के वोट के अधिकार से वंचित किए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाया। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे वोट देने का अधिकार बहुत बड़े खतरे में पड़ गया है। जस्टिस नरीमन ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने के तरीके से ही हटाया जा सकता है। इससे उनका कार्यकाल सुरक्षित रहता है। उन्होंने कहा हमने हाल ही में ऐसा होने का खतरा देखा है। सभी ने देखा है कि पश्चिम बंगाल के चुनावों में 90 लाख मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। यह एक हैरान कर देने वाला आंकड़ा है। 90 लाख मतदाताओं का वोट देने का अधिकार छिन जाना भी किसी तरह सुप्रीम कोर्ट को इतना प्रभावित नहीं कर सका कि वह इसे रोक दे।
