केवल संदेह के आधार पर व्यक्ति को हिरासत में लिया गया
ट्रायल कोर्ट ने जांच सही से नहीं की,हाई कोर्ट मूकदर्शक बना रहा
नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे शख्स को बरी किया है, जिसे अपनी जिंदगी के 22 साल जेल में गुजारने पड़े। यह सब उसे ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट की वजह से भुगतना पड़ा। क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की सही से जांच नहीं की और दोषी ठहराए जाने के बाद हाई कोर्ट ने उसकी अपील पर सुनवाई नहीं की, यानी हाई कोर्ट मौन बना रहा।
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने तमाम बिंदुओं पर ध्यान देते हुए उसे बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट को यह स्वीकार करना पड़ा कि “न्याय तक पहुंच अभी भी हमारे समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों और विशेष रूप से उनमें से दोषी ठहराए गए और जेल में बंद लोगों से दूर है। जस्टिस जेबी परदीवाला और के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कहा कि जब लोकतंत्र के तीनों स्तंभ लगातार हर नागरिक, विशेषकर गरीबों के घर तक कानूनी सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं, तब हमें उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। केवल उदार दृष्टिकोण ही नहीं, बल्कि एक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए ताकि किसी दोषी के अदालत का दरवाजा खटखटाने पर होने वाली देरी को माफ किया जा सके, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जो इस मामले में कुछ गंभीर चिंताएं पैदा करता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर व्यक्ति को हिरासत में लिया गया। उससे थर्ड डिग्री देकर इकबालिया बयान लिया गया, जिसे कानून में सबूत के तौर पर स्वीकार भी नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की सही तरीके से जांच नहीं की और हाई कोर्ट भी मूकदर्शक बना रहा। जिसके चलते बिना किसी मजबूत सबूत के उस व्यक्ति की जिंदगी के 22 साल बर्बाद हो गए। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट को इस बात पर भी विचार करना चाहिए था कि यह जेल के माध्यम से अपील थी और न्यायालय को इस मामले का व्यावहारिक दृष्टिकोण, या बल्कि सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था और कम से कम याचिकाकर्ता को अपनी आपराधिक अपील पर गुण-दोष के आधार पर बहस करने का एक अवसर देने के लिए देरी को माफ कर देना चाहिए था।
बिना किसी मजबूत सबूत के जिंदगी के 22 साल बर्बाद हो गए : सुप्रीम कोर्ट