पश्चाताप से खोई हुई जिंदगी को नहीं लौटाया जा सकता : इलाहाबाद हाई कोर्ट


वक्त रहते दखल जरूरी
लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में दहेज उत्पीडऩ और घरेलू क्रूरता को लेकर सख्त टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि विवाहित महिला के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को दहेज उत्पीडऩ या घरेलू क्रूरता की उसकी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा कि दहेज उत्पीडऩ या वैवाहिक क्रूरता के पीडि़तों से समझौता करने की सलाह देने से उनका हौसला बढ़ेगा।
हाई कोर्ट ने कहा “अक्सर दहेज उत्पीडऩ की शिकार महिला को बार-बार अपने परिवार को अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में बताने के बावजूद समझौता करने, विवाह बचाने या तालमेल बिठाने की सलाह दी जाती है। न्यायालय का मानना ??है कि ऐसी सलाह अनजाने में ही अपराधियों को और ज्यादा साहसी बना सकती है और पीडि़ता को निरंतर दुर्व्यवहार का शिकार बना सकती है, जिसके परिणामस्वरूप अंतत: पीडि़ता की मृत्यु तक जैसे दुखद और अपरिवर्तनीय परिणाम हो सकते हैं।” अदालत ने गौर किया कि पीडि़ता ने कई मौकों पर अपने परिवार के सदस्यों को अपने ससुराल वालों द्वारा लगातार दहेज की मांग और उनके द्वारा किए जा रहे उत्पीडऩ के बारे में बताया था। पीठ ने कहा कि इस तरह की बार-बार की शिकायतों को सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं माना जाना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि इन्हें मदद, सुरक्षा और समय पर हस्तक्षेप की वास्तविक गुहार के रूप में पहचाना जाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि कोर्ट का यह मत है कि इस मामले के तथ्य इस बात की याद दिलाते हैं कि जब भी कोई बेटी बार-बार अपने परिवार से सहायता मांगती है और अपने ससुराल में हो रहे उत्पीडऩ, भय और अपमान को व्यक्त करती है, तो उसकी चिंताओं को सहानुभूति, गंभीरता और तत्परता के साथ सुना जाना चाहिए। परिवार का यह नैतिक और सामाजिक दायित्व है कि वह उसका समर्थन करे, उसकी बात पर विश्वास करे और उसकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए।

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